कोसी नदी, जो उत्तराखंड की पहाड़ियों से निकलकर उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों तक का सफर तय करती है, आज केवल जलधारा मात्र नहीं रह गई है, बल्कि यह करोड़ों रुपये के 'रेत-बजरी' कारोबार और प्रशासनिक विवादों का केंद्र बन चुकी है। इस नदी का अस्तित्व, इसमें होने वाला खनन और मीडिया द्वारा इसे लेकर दिखाई जाने वाली खबरें एक ऐसा त्रिकोण बनाती हैं, जिसमें सच और सनसनी के बीच की रेखा बेहद धुंधली है।
कोसी नदी का भूगोल और सरकारी वजूद
उत्तराखंड की कोसी नदी अल्मोड़ा जिले में कौसानी के पास 'धारपानी धार' से निकलती है। यहाँ से यह नदी दक्षिण की ओर बहते हुए सोमेश्वर घाटी, खैरना और फिर रामनगर पहुंचती है। रामनगर में यह विश्व प्रसिद्ध जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क की सीमा तय करती है। इसके बाद यह ऊधम सिंह नगर जिले के बाजपुर और सुल्तानपुर पट्टी से होते हुए उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले में प्रवेश करती है और अंततः रामगंगा में मिल जाती है।
सरकारी नक्शों की बात करें, तो कोसी नदी का अस्तित्व पूरी तरह स्पष्ट और प्रमाणित है। राजस्व विभाग के अभिलेखों में इसके बहाव क्षेत्र (Riverbed) को बाकायदा श्रेणीबद्ध किया गया है। यह कोई 'गुमनाम' नदी नहीं है, बल्कि उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश, दोनों राज्यों के सिंचाई और राजस्व विभागों के लिए यह एक महत्वपूर्ण परिसंपत्ति है। सरकार हर साल इस नदी के विभिन्न हिस्सों में 'चुगान' (खनन) के लिए बाकायदा टेंडर निकालती है और इसके लिए पर्यावरण मंत्रालय से क्लीयरेंस भी लिया जाता है।
उत्तराखंड की खनन नीति: एक दोधारी तलवार
उत्तराखंड की वर्तमान खनन नीति 'उत्तराखंड खनिज नियमावली' के तहत संचालित होती है। इस नीति का मुख्य उद्देश्य 'चैनलाइजेशन' है। सरकार का तर्क है कि हर साल बरसात में पहाड़ियों से बहकर भारी मात्रा में बोल्डर और रेत नदी के तल में जमा हो जाते हैं। यदि इसे नहीं निकाला गया, तो नदी का स्तर बढ़ जाएगा और पानी बस्तियों में घुसकर तबाही मचाएगा।
नीति के तहत, नदी के कुछ हिस्सों को 'लॉट' में बांटा जाता है और उनकी नीलामी की जाती है। नियम बड़े सख्त हैं, रात में खनन नहीं होगा, नदी के बीचों-बीच गड्ढे नहीं किए जाएंगे, और मशीनों के बजाय मैनुअल (श्रमिकों द्वारा) खनन को प्राथमिकता दी जाएगी ताकि स्थानीय लोगों को रोजगार मिले। लेकिन भ्रष्टाचार की जड़ यहीं से शुरू होती है। जब ठेकेदार कम समय में ज्यादा मुनाफा कमाना चाहते हैं, तो वे प्रतिबंधित पोकलैंड मशीनों का उपयोग करते हैं और स्वीकृत सीमा से कई गुना ज्यादा माल उठा लेते हैं।
मीडिया की भूमिका: सनसनी, सरोकार या स्वार्थ?
यह बात मीडिया के एक कड़वे और अनकहे सच की ओर इशारा करती है। पत्रकारिता जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, उसकी आड़ में कई बार 'न्यूज' का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में किया जाता है। जब कोई मीडिया हाउस किसी विशेष क्षेत्र, जैसे कोसी नदी के खनन, को लेकर अचानक 'युद्ध स्तर' पर सक्रिय हो जाता है, तो इसके पीछे हमेशा जनहित ही नहीं होता, बल्कि कई बार इसके आर्थिक और रणनीतिक निहितार्थ भी होते हैं।
आर्थिक लाभ और 'ब्लैकमेलिंग' का खेल
अक्सर देखा गया है कि जब सरकार या जिला प्रशासन किसी मीडिया संस्थान के विज्ञापनों में कटौती करता है या उनके बकाया भुगतानों में देरी करता है, तो खबरें अचानक 'आक्रामक' होने लगती हैं। खनन एक ऐसा संवेदनशील मुद्दा है जहाँ कमियां ढूंढना सबसे आसान है। नियमों की बारीकियां इतनी जटिल हैं कि किसी भी वैध पट्टे में छोटी-मोटी तकनीकी खामी निकालकर उसे 'महाघोटाला' करार देना मीडिया के लिए कठिन नहीं होता। यह दबाव बनाने का एक तरीका है ताकि प्रशासन समझौते की मेज पर आए और विज्ञापनों का प्रवाह फिर से शुरू हो सके। स्थानीय स्तर पर तो यह समस्या और भी गंभीर है। स्थानीय अखबार खनन ठेकेदारों से सीधे 'महीना' या आर्थिक लाभ की अपेक्षा रखते हैं। जब ठेकेदार इस मांग को अनसुना करता है, तो अगले दिन से उसकी डंपर-ट्रॉली और मशीनों की तस्वीरें 'अवैध खनन' की हेडलाइन के साथ प्रसारित होने लगती हैं। यहाँ 'नियम' गौण हो जाते हैं और 'नियत' केवल निजी स्वार्थ की सिद्धि बन जाती है।
प्रशासन का रुख और रामपुर डीएम का खंडन
यही वह मुख्य कारण है जिसकी वजह से रामपुर जिलाधिकारी अजय कुमार द्विवेदी जैसे अधिकारियों को कड़ा रुख अपनाना पड़ता है। जब प्रशासन को यह आभास होता है कि खबर तथ्यों पर नहीं, बल्कि 'दबाव बनाने की रणनीति' पर आधारित है, तो वे सार्वजनिक रूप से खंडन जारी करते हैं। प्रशासनिक अधिकारी जानते हैं कि यदि वे हर सनसनीखेज खबर पर नतमस्तक होंगे, तो यह ब्लैकमेलिंग का एक अंतहीन सिलसिला बन जाएगा।
प्रशासन 'नतमस्तक' या मीडिया 'आक्रामक'?
मीडिया अक्सर आरोप लगाता है कि खनन माफियाओं के आगे प्रशासन नतमस्तक है। लेकिन क्या यह आरोप हमेशा सही होता है? हाल ही में रामपुर के जिलाधिकारी अजय कुमार द्विवेदी ने एक प्रमुख अखबार की रिपोर्ट का जिस तरह खंडन किया, उसने इस विमर्श को नई दिशा दी है। अधिकारी अक्सर इसलिए चुप रहते हैं क्योंकि मीडिया से टकराव उनके करियर के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। लेकिन रामपुर डीएम का कदम बताता है कि जब प्रशासन के पास पुख्ता तथ्य होते हैं, तो वे 'मीडिया ट्रायल' के सामने झुकने के बजाय खंडन का रास्ता चुनते हैं।
नियम और नियत की जंग
कोसी नदी का मुद्दा अब केवल पत्थर और रेत का नहीं रह गया है। यह दरअसल नियम और नियत के बीच के संघर्ष की कहानी बन चुकी है। जहाँ एक ओर ठेकेदारों की मुनाफाखोरी और निचले स्तर के अधिकारियों की मिलीभगत है, वहीं दूसरी ओर मीडिया के अपने आर्थिक हित भी इस आग को हवा देते हैं। कोसी नदी के मुद्दे पर मीडिया की अति-सक्रियता कभी-कभी वास्तविक अवैध खनन को रोकने के बजाय निजी हितों को साधने का जरिया बन जाती है। जब खबरों का उद्देश्य सुधार के बजाय 'सौदा' हो जाता है, तो पत्रकारिता की विश्वसनीयता खत्म होने लगती है। यही कारण है कि आज पाठक और प्रशासन दोनों ही ऐसी खबरों को संदेह की दृष्टि से देखते हैं और सच कहीं इन दांव-पेंचों के बीच दबकर रह जाता है। वहीँ दूसरी तरफ जब तक खनन प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता नहीं आएगी और तकनीक के जरिए इसकी निगरानी नहीं होगी, तब तक मीडिया सवाल उठाता रहेगा और प्रशासन अपनी साख बचाने के लिए इसी तरह जद्दोजहद करता नजर आएगा।