इंदौर, जिसे हम देश के सबसे स्वच्छ शहर के रूप में जानते हैं, आज वहां स्वच्छता के दावों के नीचे मौत का मातम पसरा है। दूषित पानी ने जब मासूमों की सांसें छीनीं, तो उम्मीद थी कि सत्ता के गलियारों से सांत्वना के शब्द निकलेंगे, लेकिन इसके उलट वहां से अहंकार की दुर्गंध आने लगी। व्यवस्था की लापरवाही से उजड़ते घरों के बीच जिम्मेदार नेताओं का व्यवहार यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या लोकतंत्र में जनसेवक अब खुद को जनता का 'राजा' समझने लगे हैं?

​सत्ता की हनक और शब्दों की मर्यादा का पतन

​लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन होती है; वही शून्य से शिखर तक पहुँचाती है और वही अहंकार टूटने पर फर्श पर लाने की ताकत रखती है। लेकिन जब सत्ता का नशा सिर चढ़कर बोलने लगे, तो नेताओं की भाषा से मर्यादा लुप्त हो जाती है। इंदौर की त्रासदी के बीच 'घंटा' जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना उस सत्ता की हनक का भद्दा प्रदर्शन है।

​जब किसी मां की गोद सूनी हो रही हो और घरों से अर्थियां उठ रही हों, तब एक जनसेवक की जुबान से निकलने वाले ऐसे शब्द जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा काम करते हैं। यह उस संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है, जहाँ नेताओं को समाधान देने के बजाय मीडिया के सवालों पर झुंझलाहट और कुतर्क सूझ रहे हैं। यह घटना उन तमाम राजनेताओं के लिए एक कड़ा सबक है जो यह भूल चुके हैं कि वे जनता के दिए हुए पदों पर केवल एक 'सेवक' की हैसियत से बैठे हैं, हुकूमत करने के लिए नहीं।

​विवादों का पुराना नाता और माफीनामा का ढर्रा

​कैलाश विजयवर्गीय के लिए विवादित बयान देना और फिर विरोध की तपिश बढ़ने पर 'खेद' की चादर ओढ़ लेना कोई नई बात नहीं है। यह उनकी राजनीति का एक चिर-परिचित ढर्रा बन चुका है। अतीत में सरकारी अधिकारियों को 'घुटने टिकवा देने' की धमकी हो, महिलाओं के पहनावे पर 'शूर्पणखा' जैसी आपत्तिजनक टिप्पणी हो, या 'बल्ला कांड' का बचाव—विजयवर्गीय की कार्यशैली हमेशा आक्रामक और अक्सर मर्यादहीन रही है।


Advertisement

​विडंबना देखिए कि हर बार जब चौतरफा घेराबंदी होती है, तब वे इसी तरह माफी मांगकर मामले को शांत करने की कोशिश करते हैं। क्या यह 'खेद' वास्तव में आत्मग्लानि का परिणाम है या फिर केवल राजनीतिक जमीन खिसकने का डर?

​आधी रात वाली सफाई: संवेदना या डैमेज कंट्रोल?

​रात के सन्नाटे में, 11:36 बजे सोशल मीडिया पर आया स्पष्टीकरण किसी सहानुभूति का हिस्सा नहीं, बल्कि बढ़ते जन-आक्रोश को रोकने की एक कवायद थी। दो दिनों की थकान और जागने का तर्क देकर अपनी बदजुबानी का बचाव करना तर्कसंगत नहीं लगता। क्या थकान किसी नेता को इतना संवेदनहीन होने का लाइसेंस दे देती है कि वह अपने ही लोगों के प्रति अपमानजनक हो जाए?

​यह 'आधी रात वाली सफाई' सोशल मीडिया पर उड़ रही साख की धज्जियां बचाने के लिए किया गया एक डैमेज कंट्रोल मात्र है। यह पोस्ट किसी दुखियारे के आंसू पोंछने के लिए नहीं, बल्कि अपनी सियासी जमीन को बचाने के लिए लिखा गया एक चुनावी पर्चा ज्यादा प्रतीत होता है।

​सिस्टम के असली गुनहगार और जनता का सवाल

​जिस शहर को स्वच्छता में सात बार नंबर वन का तमगा मिला, वहां की पाइपलाइनों में दौड़ते 'जहर' ने प्रशासन के खोखले दावों की कलई खोलकर रख दी है। सवाल केवल एक बयान का नहीं है, बल्कि उस पूरे सड़े-गले सिस्टम का है जिसकी नाक के नीचे जनता गंदा पानी पीने को मजबूर रही। इंदौर की गलियों से निकला यह गुस्सा उन सभी अधिकारियों और नेताओं के खिलाफ है जो इंसानी जान से ज्यादा आंकड़ों और रैंकिंग को अहमियत देते हैं।

​जब तक मासूमों की मौतों के असली जिम्मेदार अधिकारियों को सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाता, तब तक इन कागजी खेदों और झूठे संकल्पों का कोई मोल नहीं है। नेताओं को समझना होगा कि जनता की याददाश्त अब कमजोर नहीं रही। आप राजा नहीं हैं कि कुछ भी बोलकर निकल जाएंगे; आप जवाबदेह सेवक हैं और जिस दिन सेवक अपनी मर्यादा भूलता है, उस दिन जनता अपनी ताकत का अहसास कराना बखूबी जानती है।

इंदौर की यह त्रासदी और उसके बाद का सियासी तमाशा लोकतंत्र के लिए एक चेतावनी है। यह समय आत्ममंथन का है—प्रशासन के लिए भी और उन राजनेताओं के लिए भी जो अहंकार के मद में चूर हैं। व्यवस्था सुधारने के लिए केवल 'नंबर वन' के टैग की नहीं, बल्कि शुद्ध पानी और शुद्ध नीयत की जरूरत है।

---समाप्त---