मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में दूषित पानी से हुई बच्चों की मौतों का मामला अब एक बड़े राजनीतिक और भाषाई विवाद में तब्दील हो गया है। सोशल मीडिया से लेकर सियासी गलियारों तक यह आरोप लग रहे हैं कि प्रदेश के नगरीय विकास एवं आवास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने इस त्रासदी पर संवेदनशीलता दिखाने के बजाय सवाल पूछने वाले मीडियाकर्मी के साथ अभद्र व्यवहार किया। वायरल वीडियो के आधार पर यह दावा किया जा रहा है कि जब एनडीटीवी के पत्रकार अनुराग द्वारी ने मौतों की जवाबदेही पर प्रश्न किया, तो मंत्री ने उसे 'फोकट का सवाल' करार दिया। सबसे ज्यादा बहस उस 'घंटा' शब्द के इस्तेमाल पर हो रही है, जिसे लेकर विपक्ष और आम नागरिक इसे सत्ता के अहंकार का परिचायक बता रहे हैं।

​सोशल मीडिया पर 'संवेदनशीलता' बनाम 'सत्ता' की बहस

​इस घटना के बाद डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बहस छिड़ गई है। एक्स (पूर्व में ट्विटर) और फेसबुक पर यूजर्स मंत्री के इस व्यवहार को 'असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा' बता रहे हैं। कई यूजर्स का आरोप है कि जब शहर में मासूमों के जनाजे उठ रहे हों, तब एक जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति का लहजा इतना आक्रामक और अपमानजनक कैसे हो सकता है। सोशल मीडिया पर लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या अब लोकतंत्र में बुनियादी सुविधाओं की कमी पर सवाल पूछना भी 'फालतू' काम माना जाएगा? वहीं, कुछ लोग इसे पत्रकारिता के चौथे स्तंभ पर सीधा प्रहार बता रहे हैं, जिसमें तथ्यों पर बात करने के बजाय पत्रकार को व्यक्तिगत रूप से नीचा दिखाने की कोशिश की गई।

​क्या विभाग अपनी विफलता छिपाने के लिए आक्रामक है?

​इंदौर नगर निगम और नगरीय प्रशासन विभाग पर यह गंभीर आरोप लग रहे हैं कि पाइपलाइन में सीवरेज के पानी का मिलना और उससे हुई मौतें एक प्रशासनिक अपराध है। आलोचकों का तर्क है कि मंत्री कैलाश विजयवर्गीय द्वारा पत्रकार को झिड़कना और 'घंटा' जैसे शब्दों का प्रयोग करना असल में विभाग की नाकामी से ध्यान भटकाने की एक कोशिश हो सकती है। संसदीय कार्य मंत्री होने के नाते उन पर यह आरोप भी लग रहे हैं कि उन्होंने उस संसदीय मर्यादा का उल्लंघन किया है, जो उन्हें जनता के प्रति जवाबदेह बनाती है। विपक्ष का कहना है कि यह व्यवहार उस निरंकुशता को दर्शाता है जहाँ सरकार खुद को हर तरह के सवालों से ऊपर मानने लगी है।

​प्रशासन और मंत्री के पक्ष का इंतजार

​हालांकि इस तीखी बहस के बीच अभी तक मंत्री कार्यालय या सरकार की ओर से इस विशिष्ट भाषाई विवाद पर कोई औपचारिक स्पष्टीकरण नहीं आया है, लेकिन जनता के बीच नाराजगी कम नहीं हो रही है। आरोप है कि एक तरफ अस्पताल में मासूमों के परिजन इंसाफ के लिए भटक रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग सवालों को ही सिरे से खारिज कर रहे हैं। इंदौर के जागरूक नागरिकों का कहना है कि जांच समितियां तो बनती रहेंगी, लेकिन सार्वजनिक जीवन में जो भाषा की मर्यादा टूटी है, उसने लोकतंत्र की गरिमा को गहरी चोट पहुंचाई है। अब देखना यह होगा कि क्या मुख्यमंत्री इस मामले में दखल देकर अपने मंत्रियों को मर्यादा का पाठ पढ़ाते हैं या यह विवाद यूं ही बढ़ता रहेगा।


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