इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित जल से हुई त्रासदी पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने अत्यंत कड़ा रुख अपनाते हुए प्रशासन को आड़े हाथों लिया है। इंदौर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रितेश इनानी और अन्य द्वारा दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए जस्टिस राजेश कुमार गुप्ता और जस्टिस बी.पी. शर्मा की वेकेशन बेंच ने स्पष्ट किया है कि नागरिकों के स्वास्थ्य के साथ किसी भी तरह का खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जनता को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना नगर निगम की बुनियादी जिम्मेदारी है और इसमें लापरवाही एक गंभीर अपराध है।
न्यायालय ने मानवीय आधार पर बड़ा फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को आदेश दिया है कि इस त्रासदी से प्रभावित होने वाले प्रत्येक मरीज का इलाज पूरी तरह निःशुल्क किया जाए। कोर्ट ने निर्देशित किया है कि मरीज चाहे सरकारी अस्पताल में भर्ती हो या निजी, उनके उपचार का समस्त व्यय सरकार को वहन करना होगा। इसके साथ ही नगर निगम को प्रभावित क्षेत्रों में तत्काल शुद्ध पेयजल की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
इस मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और नगर निगम से 2 जनवरी तक विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट तलब की है। इस रिपोर्ट में प्रशासन को मौतों का सटीक डेटा, उपचाराधीन मरीजों की संख्या, पाइपलाइन में लीकेज के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के नाम और भविष्य के लिए बनाई गई कार्ययोजना की जानकारी देनी होगी। याचिकाकर्ताओं ने इसे प्रशासनिक हत्या करार देते हुए दोषी उच्च अधिकारियों पर आपराधिक मुकदमा दर्ज करने और पीड़ित परिवारों को भारी मुआवजा देने की मांग की है। हालांकि प्रशासन ने कुछ निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई की है, लेकिन अदालत की सख्ती के बाद अब बड़े अधिकारियों पर जवाबदेही का दबाव बढ़ गया है। शहर की जल और सीवेज लाइन के ऑडिट की मांग भी जोर पकड़ रही है, जिससे निगम की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।
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