इंदौर के चमकदार और साफ-सुथरे शहर होने के दावों के पीछे एक ऐसी हकीकत छिपी थी, जिसकी कीमत यहाँ के गरीब रहवासियों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। भागीरथपुरा की तंग गलियों में जब नलों से पानी की जगह मौत की सप्लाई होने लगी, तब प्रशासन की नींद टूटी। नर्मदा की जिस पाइपलाइन को जीवनदायिनी माना जाता था, उसमें मिले सीवेज के जहर ने सैकड़ों घरों के चूल्हे बुझा दिए। सरकारी आंकड़ों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई इतनी गहरी है कि अब प्रशासन के हर दावे पर सवाल उठ रहे हैं। यह महज एक तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि उस सिस्टम की सामूहिक विफलता है जो महीनों से मिल रही शिकायतों को रद्दी की टोकरी में डालता रहा।
जब बाइक की रफ्तार ने छिपाई बेबसी
क्षेत्रीय दौरे के दौरान जो मंजर दिखा, उसने लोकतंत्र की उस तस्वीर को उजागर किया जहाँ जनता के सवाल और नेताओं की जवाबदेही के बीच दूरी स्पष्ट नजर आई। जब स्थानीय महिलाओं ने मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को घेरकर उस नाले की हकीकत दिखाने की कोशिश की जिसने उनके बच्चों को बीमार किया, तो वहां मौजूद पार्षद की घबराहट ने कई राज खोल दिए। बाइक की बढ़ती रफ्तार ने यह साफ कर दिया कि स्थानीय जनप्रतिनिधि जनाक्रोश का सामना करने का साहस खो चुके थे। गलियों के भीतर जाने का जोखिम न उठाना यह दर्शाता है कि सत्ता को शायद इस बात का इल्म था कि जमीन पर नाराजगी का लावा किस कदर उबल रहा है।
आंकड़ों की बाजीगरी और मुआवजे का अपमान
त्रासदी के बाद का सबसे वीभत्स पहलू मौतों की संख्या को लेकर जारी खींचतान है। प्रशासन जहाँ मौतों को डायरिया के सरकारी खाने में फिट करने की कोशिश कर रहा है, वहीं श्मशान और घरों से आती खबरें 13 से ज्यादा मौतों की गवाही दे रही हैं। सरकारी अस्पताल के बाहर खड़ा हर परिवार एक ही सवाल पूछ रहा है कि क्या उनके अपनों की जान की कीमत महज दो लाख रुपये का चेक है। परिजनों का चेक लेने से शुरुआती इनकार दरअसल उस व्यवस्था के खिलाफ एक मौन विद्रोह था, जिसने छह महीने तक उनकी शिकायतों को अनसुना किया। 1400 से ज्यादा लोगों का बीमार होना यह साबित करने के लिए काफी है कि यह कोई सामान्य लीकेज नहीं बल्कि एक मानव-निर्मित त्रासदी है।
'घंटा' विवाद और संवेदनशीलता का अकाल
जब एक राष्ट्रीय चैनल के पत्रकार ने मौतों की जिम्मेदारी और छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई को लेकर सवाल पूछा, तो सत्ता के गलियारों से जो जवाब आया उसने पूरी मानवता को शर्मसार कर दिया। 'घंटा' जैसे शब्दों का इस्तेमाल केवल एक मंत्री की निजी झल्लाहट नहीं थी, बल्कि यह उस मानसिकता का परिचय था जो जनता के प्रति जवाबदेह होने के बजाय उसे दबाने में विश्वास रखती है। हालांकि बाद में तनाव और नींद की कमी का हवाला देकर माफी मांग ली गई, लेकिन प्रभावित परिवारों के जख्मों पर यह शब्द नमक की तरह लगे। विपक्ष ने इस मुद्दे को लेकर अब सरकार को चौतरफा घेर लिया है, जहाँ इस्तीफे की मांग और 'गैर-इरादतन हत्या' के मुकदमों की चर्चा तेज हो गई है।
जवाबदेही की बलि और भविष्य का डर
नगर निगम के कुछ अधिकारियों को बर्खास्त या निलंबित कर देने भर से भागीरथपुरा के आंसू नहीं सूखेंगे। इंदौर को नंबर वन बनाने की होड़ में शायद बुनियादी ढांचे की मजबूती और गरीबों की बस्तियों में मिल रहे पानी की गुणवत्ता को नजरअंदाज कर दिया गया। हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अब भले ही नई पाइपलाइन बिछाई जा रही हो और मुफ्त इलाज के वादे किए जा रहे हों, लेकिन यह सवाल अपनी जगह कायम है कि क्या भविष्य में फिर किसी बस्ती को अपनी प्यास बुझाने के लिए इतनी बड़ी कीमत चुकानी होगी। इंदौर का यह घाव आने वाले लंबे समय तक राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में व्यवस्था की विफलता की याद दिलाता रहेगा।
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