​नैनीताल। ज़िले के हल्द्वानी स्थित बनभूलपुरा रेलवे भूमि अतिक्रमण मामले में आज, 10 दिसंबर 2025, को सुप्रीम कोर्ट का संभावित निर्णायक फैसला एक बार फिर टल गया है। यह मामला आज की कॉज लिस्ट में सूचीबद्ध था, लेकिन अन्य मामलों की लंबी सुनवाई के कारण बनभूलपुरा प्रकरण पर सुनवाई नहीं हो सकी और इसे टाल दिया गया। अब ​इस बहुप्रतीक्षित मामले की अगली सुनवाई अब 16 दिसंबर 2025 को तय की गई है।

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​सुरक्षा का कड़ा पहरा: छावनी बना हल्द्वानी

​फैसले की आशंका के मद्देनज़र, आज सुबह से ही हल्द्वानी और विशेष रूप से बनभूलपुरा क्षेत्र में सुरक्षा के बेहद कड़े इंतजाम किए गए थे। पूरे शहर को एक तरह से छावनी में तब्दील कर दिया गया था।

  • हाई अलर्ट: बनभूलपुरा क्षेत्र को हाई अलर्ट पर रखा गया था।
  • सुरक्षा बलों की तैनाती: इलाके में भारी पुलिस बल, पीएसी (प्रांतीय सशस्त्र बल), टियर गैस यूनिट और निगरानी के लिए ड्रोन की तैनाती की गई थी।
  • आवाजाही पर रोक: बाहरी लोगों की आवाजाही पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई थी, और स्थानीय निवासियों की भी पहचान पत्र (आईडी) की जांच की जा रही थी।
  • गिरफ्तारियां: कानून-व्यवस्था बनाए रखने और किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए पुलिस ने 17 लोगों को गिरफ्तार किया और 136 लोगों को शांति भंग की आशंका के तहत 'पाबंद' किया है।
  • प्रशासनिक मुस्तैदी: एसएसपी सहित पूरा पुलिस और प्रशासनिक अमला दिन भर मौके पर मुस्तैद रहा।

​4365 परिवारों का भविष्य दांव पर

​यह मामला लगभग 29 हेक्टेयर रेलवे भूमि से जुड़ा हुआ है, जिस पर लगभग 4365 परिवार (जिनमें 50 हजार से अधिक लोग शामिल हैं) बरसों से निवास कर रहे हैं। इन सभी परिवारों का भविष्य अब सुप्रीम कोर्ट के आगामी निर्णय पर टिका हुआ है।


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​बनभूलपुरा का ऐतिहासिक परिदृश्य

​बनभूलपुरा क्षेत्र, जिसे इस विवाद ने राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया है, एक पुराना इलाका है जिसका इतिहास करीब 100 साल से भी अधिक पुराना है। यह इलाका मुख्य रूप से गफूर बस्ती, ढोलक बस्ती, इंदिरानगर आदि क्षेत्रों को समाहित करता है।

​कहा जाता है कि यह बस्ती 1930 के दशक में तब बसनी शुरू हुई थी जब ब्रिटिश शासन के दौरान हल्द्वानी रेलवे स्टेशन का विस्तार हुआ। उस समय, रेलवे की सुविधाओं और माल ढुलाई के लिए काम करने वाले लोग, विशेषकर गरीब और मजदूर वर्ग, रेलवे ट्रैक के किनारे झोपड़ियाँ बनाकर बसने लगे। समय के साथ, इन अस्थाई बसावटों ने स्थायी रूप ले लिया।

​आज़ादी के बाद, यह क्षेत्र धीरे-धीरे बढ़ता गया, और यहाँ रहने वाले लोगों के पास पानी, बिजली के कनेक्शन और यहाँ तक कि सरकारी स्कूल भी स्थापित हो गए। दशकों तक, इस क्षेत्र को लेकर कोई बड़ा विवाद नहीं उठा, जिससे स्थानीय लोगों को लगा कि यह उनकी वैध भूमि है।

​विवाद तब गहराया जब रेलवे ने अपनी भूमि का सीमांकन किया और इस पूरी बस्ती को 'अतिक्रमण' घोषित कर दिया। 2017 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रेलवे के पक्ष में फैसला सुनाया, जिसके बाद 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाई थी और मानवीय पहलू को ध्यान में रखते हुए समाधान खोजने का निर्देश दिया था।

​सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनवाई टाले जाने के बाद, अब सभी की निगाहें 16 दिसंबर 2025 को होने वाली अगली सुनवाई पर केंद्रित हो गई हैं, जो इस जटिल और संवेदनशील मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है।

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