नई दिल्ली, (उत्तराखण्ड तहलका): भारत में सदियों से चली आ रही 'महिला खतना' (Female Genital Mutilation - FGM) या ‘खत्ना’ की प्रथा एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के रडार पर है। सुप्रीम कोर्ट ने इस अमानवीय प्रथा पर प्रतिबंध लगाने की मांग वाली एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर दिया है। याचिका में साफ तौर पर कहा गया है कि यह प्रथा POCSO (Protection of Children from Sexual Offences) ऐक्ट और बच्चों के मौलिक अधिकारों का खुला उल्लंघन है।

विशेषकर दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित महिलाओं का खतना (FGM) करने की प्रथा पर प्रतिबंध लगाने संबंधी याचिका पर विचार करने के लिए SC शुक्रवार को सहमत हो गया है।
मुख्य मुद्दा: POCSO ऐक्ट का उल्लंघन
एक गैर-सरकारी संगठन (चेतना वेलफेयर सोसाइटी) द्वारा दायर इस याचिका में मुख्य रूप से यह तर्क दिया गया है कि:
गैर-चिकित्सीय स्पर्श: POCSO अधिनियम के तहत, किसी भी नाबालिग के जननांगों को गैर-चिकित्सकीय कारणों से छूना या उसमें बदलाव करना एक अपराध है। खतना (Female Circumcision/Khafz) की प्रक्रिया में, जो आमतौर पर 7 साल की कम उम्र की बच्चियों पर की जाती है, उनके जननांगों के एक हिस्से को काट दिया जाता है।
बच्चों के अधिकार: याचिका में कहा गया है कि यह प्रथा बच्चों के शरीर की स्वायत्तता (Bodily Integrity), निजता (Privacy) और सम्मान (Dignity) के मौलिक अधिकारों (संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21) का गंभीर उल्लंघन है।
याचिकाकर्ताओं का यह भी दावा है कि खतना इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है, और इसका उद्देश्य महिलाओं की यौन इच्छा को कम करना होता है, जो कि पूरी तरह से प्रतिगामी (Regressive) सोच है।
सुप्रीम कोर्ट का रुख और याचिका की मांगें
न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और आर. महादेवन की पीठ ने इस याचिका पर विचार करने के लिए सहमति व्यक्त की और केंद्र सरकार तथा कानून मंत्रालय को नोटिस जारी कर उनका जवाब मांगा है।
याचिका में अदालत से निम्नलिखित प्रमुख कदम उठाने की मांग की गई है:
पूर्ण प्रतिबंध: लड़कियों के खतना की प्रथा पर तुरंत और पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया जाए।
कानूनी दिशा-निर्देश: देश में इस प्रथा पर रोक लगाने और कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए बाध्यकारी कानूनी दिशा-निर्देश तैयार किए जाएं।
POCSO के तहत कार्रवाई: इस प्रथा को POCSO ऐक्ट के तहत गंभीर अपराध मानते हुए दोषियों पर कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
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वैश्विक निंदा और स्वास्थ्य जोखिम
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने महिला खतना (FGM) को लड़कियों और महिलाओं के मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन बताया है। याचिका में अंतरराष्ट्रीय निकायों के कई अध्ययनों का हवाला दिया गया है, जो बताते हैं कि:
शारीरिक और मनोवैज्ञानिक नुकसान: खतना के कारण बच्चियों में संक्रमण, रक्तस्राव, पेशाब संबंधी समस्याएँ, और भविष्य में प्रसव संबंधी जटिलताओं के साथ-साथ गंभीर मनोवैज्ञानिक आघात भी हो सकता है।
अंतरराष्ट्रीय कानून: संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने भी इस प्रथा को समाप्त करने का आह्वान किया है। अमेरिका, यूके और ऑस्ट्रेलिया सहित कई देशों में इस पर पहले ही प्रतिबंध लगाया जा चुका है।
आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट के नोटिस जारी करने के बाद अब केंद्र सरकार और संबंधित मंत्रालयों को इस प्रथा पर अपना पक्ष रखना होगा। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस मामले पर क्या रुख अपनाती है, क्योंकि एक तरफ धार्मिक और सामुदायिक आस्था का सवाल है, तो दूसरी तरफ नाबालिग बच्चियों के मानवाधिकार और शारीरिक सुरक्षा का गंभीर मुद्दा।
यह मामला भारत में सामाजिक रीति-रिवाजों और संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के बीच टकराव का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है, जिस पर देश की निगाहें टिकी हुई हैं। आप सुप्रीम कोर्ट के इस फैंसले को कैसे देखते हैं, हमें जरूर बताएं!
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