नई दिल्ली (उत्तराखण्ड तहलका): संसद के शीतकालीन सत्र से ठीक पहले, Rajya Sabha सचिवालय द्वारा जारी किए गए एक संसदीय आचरण बुलेटिन ने देश की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। Rajya Sabha के इस बुलेटिन में सांसदों को अपने भाषण समाप्त करते समय 'जय हिंद', 'वंदे मातरम्' या यहां तक कि 'थैंक्स' जैसे शब्दों और नारों का इस्तेमाल करने से परहेज करने की सलाह दी गई है। सचिवालय ने इसे 'सदन की कार्यवाही की गरिमा और गंभीरता' बनाए रखने की सदियों पुरानी संसदीय परंपरा का हिस्सा बताया है, जबकि विपक्ष ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय भावनाओं का हनन करार दिया है।

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​Rajya Sabha के बुलेटिन में क्या कहा गया?

Rajya Sabha सचिवालय ने अपने इस निर्देश में स्पष्ट किया कि:

नारेबाजी पर रोक: "सदन की कार्यवाही की गरिमा और गंभीरता की मांग है कि सदन में 'थैंक्स', 'थैंक यू', 'जय हिन्द', 'वंदे मातरम्' या कोई अन्य नारा नहीं लगाया जाना चाहिए।" उद्देश्य: इस निर्देश का प्राथमिक लक्ष्य सदन में भाषणों के बाद होने वाले अनावश्यक व्यवधान और शोरगुल को कम करना है, और कार्यवाही को अधिक व्यवस्थित और औपचारिक बनाना है। संसदीय परंपरा: सचिवालय का तर्क है कि यह कोई नया 'आदेश' नहीं है, बल्कि सांसदों को स्थापित संसदीय परंपराओं (Parliamentary Conventions) और शिष्टाचार की याद दिलाना है।

Rajya Sabha के इस ​बुलेटिन में यह भी कहा गया है कि सदस्य सदन के अंदर या बाहर चेयर (सभापति) के फैसलों की आलोचना न करें, और अगर कोई सदस्य दूसरे की आलोचना करता है तो जवाब सुनने के लिए सदन में मौजूद रहना उनकी संसदीय जिम्मेदारी है।


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​राजनेताओं के बयान: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल

Rajya Sabha के इस निर्देश पर विपक्षी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है, उनका कहना है कि 'जय हिंद' और 'वंदे मातरम्' जैसे नारे देश के स्वतंत्रता संग्राम की धरोहर हैं, और इन्हें रोकने का प्रयास अस्वीकार्य है।

पप्पू यादव (निर्दलीय सांसद और कांग्रेस नेता):

​बिहार के पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव ने Rajya Sabha के इस बुलेटिन को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सीधा हनन बताया। उन्होंने कहा,

​"हर किसी की अपनी आजादी है। लेकिन अगर सरकार किसी चीज को थोपे, तो वह गलत है। संविधान के तहत कार्य करने में किसी को कोई दिक्कत नहीं है। कोई जय भीम लगाएगा, कोई नमो बुद्धाय लगाएगा। किसी की स्वतंत्रता नहीं छीननी चाहिए।"

 

​उन्होंने जोर देकर कहा कि ऐसे राष्ट्रीय नारों पर रोक लगाने का प्रयास राजनीतिक भावनाओं से ग्रसित है और वह सदन में इस मुद्दे को उठाएंगे।

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ममता बनर्जी (पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी):

​तृणमूल कांग्रेस (TMC) की नेता ममता बनर्जी ने भी इस निर्देश पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि 'जय हिंद' (जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नारा है) या 'वंदे मातरम्' बोलने से किसी को रोका नहीं जा सकता और जो इससे टकराएगा वह चूर-चूर हो जाएगा।

अन्य विपक्षी नेता:

शिवसेना (यूबीटी) सांसद अरविंद सावंत ने कहा कि नागरिकों को 'वंदे मातरम्' कहने का पूरा अधिकार है और वह जहां भी जरूरत होगी, इन नारों का इस्तेमाल करते रहेंगे। समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रवक्ता ने इसे हैरानी की बात बताया कि सरकार को देश की स्वतंत्रता और एकता के प्रतीकों से समस्या हो रही है।

सत्ता पक्ष का बचाव:

​दूसरी ओर, भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने इस निर्देश का बचाव किया है।

भाजपा प्रवक्ता अमित मालवीय ने कहा कि यह सरकार का आदेश नहीं है, न ही राष्ट्रीय गीत पर पाबंदी है, बल्कि यह केवल संसदीय मर्यादा बनाए रखने का नियम है, जैसा कि संविधान सभा के नेताओं ने तय किया था। उन्होंने कहा कि असल मुद्दा नियम नहीं, बल्कि विपक्ष द्वारा इस पर की जा रही राजनीति है।

​क्यों खंगाला जा रहा है इतिहास?

​यह पूरा विवाद संसदीय परंपरा बनाम राजनीतिक नारेबाजी के सवाल पर आकर अटक गया है।

परंपरा का तर्क: सदन के स्थापित नियमों और परंपराओं के अनुसार, एक सदस्य को अध्यक्ष (Chair) को संबोधित करना चाहिए, और भाषण की समाप्ति पर अध्यक्ष का आभार व्यक्त करने या नारेबाजी करने की प्रथा नहीं रही है।

राजनीतिक तर्क: पिछले कुछ वर्षों में, संसद के दोनों सदनों में भाषणों के अंत में या चर्चा के दौरान राष्ट्रीय नारों का प्रयोग तेजी से बढ़ा है, जिसे विपक्ष राजनीतिक लाभ के लिए राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति मानता है, जबकि सचिवालय इसे सदन के 'वेल' में आकर व्यवधान पैदा करने के समान मानता है।

​इस निर्देश ने एक बार फिर बहस छेड़ दी है कि क्या सदन की गरिमा को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय नारों पर रोक लगाना उचित है, या यह केवल उन राष्ट्रीय प्रतीकों को राजनीतिक विवाद से दूर रखने का एक प्रयास है।

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