स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने देश में सशस्त्र नक्सलवाद के खात्मे की बात कही। इसके साथ ही उन्होंने चेताया कि हालांकि जंगलों में हिंसा कम हुई है, लेकिन व्यवस्था में पैठ बनाए बैठे 'दिमागी नक्सल' यानी वैचारिक माओवादी सोच वाले लोग अब भी देश के लिए चुनौती बने हुए हैं। उन्होंने देशवासियों से ऐसे लोगों की पहचान कर उन्हें अलग-थलग करने का आह्वान किया।
पी. चिदंबरम का तीखा हमला
प्रधानमंत्री के इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए पूर्व गृह मंत्री और कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा— "मुझे 'दिमागी नक्सल' होने पर गर्व है!"। चिदंबरम ने सरकार की नीतियों का विरोध करने वाले विचारकों, लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को ऐसे तमगे दिए जाने की कड़ी निंदा की। उन्होंने कहा कि सरकार अपने आलोचकों को निशाना बनाने के लिए इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करती है।
अन्य प्रमुख नेताओं की प्रतिक्रियाएं
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी इस टिप्पणी पर गहरा ऐतराज जताया। उन्होंने याद दिलाया कि गृह मंत्री ने खुद संसद में स्वीकार किया था कि 'अर्बन नक्सल' जैसी कोई आधिकारिक कानूनी परिभाषा नहीं है। इसके बावजूद ऐसे राजनीतिक शब्दों का उपयोग सिर्फ राजनीतिक विरोधियों को बदनाम करने के लिए किया जा रहा है। वहीं कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर 'दिमागी नक्सल' जैसे व्यापक लेबल का इस्तेमाल करना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहद खतरनाक मिसाल कायम करता है।
विपक्षी दलों की साझा आपत्ति
तृणमूल कांग्रेस के नेता साकेत गोखले ने इसे लाल किले के ऐतिहासिक मंच से राजनीतिक विरोधियों पर कटाक्ष करने की कोशिश बताया। वामपंथी दलों के नेताओं जैसे सीपीआई (एम) के एम. ए. बेबी और सीपीआई के डी. राजा ने भी बयान को जनता से जुड़े वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने वाला बताया। सीजेपी प्रवक्ता सौरव दास और अन्य विश्लेषकों ने कहा कि अधिकार मांगने वाले पढ़े-लिखे युवाओं और बुद्धिजीवियों को इस तरह की श्रेणी में रखना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
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