तराई क्षेत्र के धुरियायी स्थित बिडुआ नगला का प्राचीन मोटा महादेव मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि यह इस इलाके के हजार साल पुराने सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने का जीता-जागता प्रमाण भी है। कल्याणी नदी के पास बने इस धाम के आसपास बिखरे खंडित अवशेषों को देखकर साफ पता चलता है कि किसी दौर में यह कोई विशाल और समृद्ध वैदिक आश्रम या मठ रहा होगा।

मंदिर में मौजूद महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा की बनावट प्राचीन मौर्य, नाग और अशोक काल की कला से मेल खाती है। लेकिन इस ऐतिहासिक संपदा की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि प्रशासनिक और सामाजिक उपेक्षा के चलते इसकी दुर्लभ प्रतिमाएं एक-एक करके गायब होती गईं और इतिहास का एक सुनहरा दौर किताबों के पन्नों में दर्ज होने से पहले ही धुंधला हो गया।
इस धाम से जुड़ी लोककथाएं और मान्यताएं आसपास के लोगों के दिलों में गहरी बैठी हुई हैं। तेला-तेली की कथा और बारात के पत्थर बन जाने की कहानियां भले ही केवल जनश्रुतियां लगती हों, लेकिन ये असल में यहां मौजूद दर्जनों प्राचीन मूर्तियों की ओर इशारा करती हैं। कल्याणी नदी के बहाव का रास्ता बदलने के बाद भी स्थानीय लोगों की श्रद्धा इस मंदिर के प्रति कम नहीं हुई है।

रुद्रपुर, बिलासपुर और टांडा के जंगलों तक फैले गांवों से लोग यहां शिवरात्रि के मेले और भंडारे में शामिल होने आते हैं। लेकिन जब किसी प्राचीन जगह की देखरेख केवल जन-आस्था के भरोसे छोड़ दी जाती है, तो उसकी अमूल्य धरोहरों पर तस्करों और असामाजिक तत्वों की नजर पड़ ही जाती है।
मुख्य मंदिर में स्थित स्वयंभू शिवलिंग को नुकसान पहुंचाने और खजाने की चाह में इसे हथौड़ों से तोड़े जाने के प्रयास यह साबित करते हैं कि सुरक्षा का इंतजाम कितना लचर रहा है। मंदिर के मालिकाना हक को लेकर खड़े हुए विवादों ने इसके रखरखाव को पूरी तरह ठप कर दिया। स्थानीय संतों और प्रबुद्ध लोगों द्वारा लगातार गुहार लगाने के बावजूद यहां न तो नियमित पुलिस सुरक्षा की तैनाती की गई और न ही पुरातत्व विभाग ने समय रहते इसकी सुध ली। किसी जगह को पर्यटन या ऐतिहासिक स्थल के रूप में विकसित न कर पाने के पीछे सबसे बड़ी वजह इच्छाशक्ति की कमी और आपसी कानूनी उलझनों को मानकर छोड़ देना है।

अगर दुनिया भर के उदाहरणों पर नजर डालें, तो यूरोप और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में सौ-दो सौ साल पुरानी इमारतों को भी विश्व स्तरीय पर्यटन स्थल बना दिया जाता है। वहां पुरातात्विक महत्व के छोटे से छोटे टुकड़ों को भी सहेजकर संग्रहालयों में रखा जाता है और शोधार्थियों को आकर्षित किया जाता है। हमारे यहां तराई क्षेत्र में चंद राजवंश के दौर के ताम्रपत्र और मुगलकालीन जिक्र तो मिलते हैं, लेकिन जमीन पर मौजूद भौतिक साक्ष्य धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं।
अब जरूरत इस बात की है कि सरकार और स्थानीय प्रशासन इस मामले में तुरंत दखल दें। सबसे पहले मंदिर परिसर का स्वामित्व विवाद सुलझाकर इसे राज्य पुरातत्व विभाग या भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन लाया जाना चाहिए। पूरे परिसर की तारबंदी करके 24 घंटे सुरक्षा बल की तैनाती की जाए और जो मूर्तियां गायब हुई हैं, उनका पुलिस रिकॉर्ड तैयार किया जाए। इसके साथ ही, कल्याणी नदी के किनारे को सुंदर बनाकर और इस क्षेत्र को आध्यात्मिक-सांस्कृतिक टूरिज्म सर्किट से जोड़कर इसे एक मॉडल धरोहर के रूप में उभारा जा सकता है। जब तक ठोस कदम नहीं उठाए जाएंगे, तब तक मिट्टी में दबा इतिहास बाहर नहीं आ पाएगा।
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