नई दिल्ली: दिल्ली की एक अदालत ने करोड़ों रुपये के कोऑपरेटिव ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी (CGHS) घोटाले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए एक रिटायर्ड IAS अधिकारी सहित 13 दोषियों को जेल की सजा सुनाई है। स्पेशल जज प्रशांत शर्मा ने फैसला सुनाते समय भ्रष्टाचार पर सख्त टिप्पणी करते हुए इसे 'समाज का कैंसर' करार दिया। जज ने जोर देकर कहा कि इस सामाजिक बुराई को खत्म करने के लिए 'कीमोथेरेपी' जैसा कठोर उपचार आवश्यक है और भ्रष्टाचार को 'लोहे के हाथों से कुचलना' होगा।

CGHSघोटाले का तरीका (Modus Operandi)

​यह व्यापक धोखाधड़ी सफदरजंग कोऑपरेटिव ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी (CGHS) से शुरू हुई, लेकिन सीबीआई जांच में पता चला कि इसमें 135 से अधिक फर्जी सोसाइटियां शामिल थीं। इन शातिर दोषियों ने जाली दस्तावेज़ तैयार करके उन सोसाइटियों को 'जिंदा' दिखाया जो वास्तव में मृत हो चुकी थीं। इसके बाद, उन्होंने इन सोसाइटियों के नाम पर दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) से बेशकीमती जमीनें अवैध रूप से हथिया लीं।

​जमीन हासिल करने के बाद, उन्होंने उस पर बने फ्लैट्स को नए सदस्यों या एजेंट्स को मनमाने और ऊंचे दामों पर बेच दिया। इस आपराधिक साजिश का सबसे बड़ा शिकार आम लोग बने—हजारों घर खरीदार बेघर हो गए, जबकि वे लंबे समय तक ईएमआई (EMI) का बोझ झेलते रहे। सीबीआई ने इस मामले में साजिश, धोखाधड़ी और जालसाजी सहित भारतीय दंड संहिता (IPC) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था।


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सजा और अदालत की सख्त टिप्पणी

​13 अक्टूबर को दोषी ठहराए गए इन लोगों को 31 अक्टूबर को सजा सुनाई गई।

  • ​कर्मवीर सिंह, नरेंद्र कुमार, महा नैन शर्मा, पंकज मदान, अहवनी शर्मा, आशुतोष पंत, सुदर्शन टंडन, मनोज वत्स, विजय ठाकर, विकास मदान और पूनम अवस्थी समेत ग्यारह दोषियों को 5 साल की जेल और जुर्माना सुनाया गया है।
  • 84 वर्षीय रिटायर्ड IAS गोपाल दीक्षित और 92 वर्षीय नरेंद्र धीर को 2 साल की सजा और जुर्माना सुनाया गया।

​जज प्रशांत शर्मा ने कहा, "भ्रष्टाचार लोकतंत्र और सामाजिक व्यवस्था का बैरी है। यह अर्थव्यवस्था को खोखला करता है और सांस्कृतिक विरासत को नष्ट। अगर शुरू में ही नहीं रोका तो समाज में उथल-पुथल मच जाएगी।" उन्होंने यह सुनिश्चित करने पर जोर दिया कि आम आदमी का न्याय व्यवस्था पर भरोसा बना रहे, इसलिए हल्की सजा देना उचित नहीं था।

CGHS के आरोपियों की दया की अपील ठुकराई

CGHS घोटाले के ​दोषियों ने अपनी बढ़ती उम्र और परिवार की जिम्मेदारियों का हवाला देकर कोर्ट से रहम की अपील की, जिसे जज ने सख्ती से खारिज कर दिया। कोर्ट ने सवाल किया, "अगर परिवार इतना ही प्यारा था, तो अपराध क्यों किया?" कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उनका एकमात्र लक्ष्य दिल्ली में सस्ती प्रॉपर्टी को जालसाजी के ज़रिए हड़पना था।

​यह फैसला एक मजबूत संदेश देता है कि उच्च पदों पर बैठे लोग भी भ्रष्टाचार के लिए जवाबदेह हैं, और कानून सभी के लिए समान है।

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