कनाडा को सुनहरे भविष्य और बेहतर जीवन की उम्मीद की धरती माना जाता है, लेकिन आज यही धरती हज़ारों भारतीय और अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए संघर्ष का मैदान बन गई है। कनाडा के अल्बर्टा प्रांत के कैलगरी और एडमॉन्टन की सड़कों पर इन दिनों अजीब सी मायूसी और आक्रोश का माहौल है। वहाँ पढ़ाई पूरी कर चुके सैकड़ों छात्र कनाडाई सरकार की नीतियों के खिलाफ सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं, क्योंकि उनके वर्षों के सपने अचानक टूटते नज़र आ रहे हैं।
इस पूरे संकट की जड़ कनाडाई इमिग्रेशन विभाग (IRCC) द्वारा इन छात्रों के पोस्ट-ग्रेजुएशन वर्क परमिट (PGWP) को अस्वीकार करना है। छात्रों का कहना है कि उन्होंने अपने और अपने परिवार की जमापूंजी या भारी-भरकम कर्ज लेकर कनाडा के कॉलेजों में दाखिला लिया था। भारी फीस भरने, कड़ाके की ठंड में पार्ट-टाइम नौकरी करने और रातों-जगकर पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें यह उम्मीद थी कि वे वर्क परमिट पाकर अपने करियर की शुरुआत करेंगे और स्थायी निवास (PR) की ओर कदम बढ़ाएंगे। लेकिन इमिग्रेशन विभाग के एक झटके ने उनके इन सपनों को चकनाचूर कर दिया है।
प्रदर्शन कर रहे छात्रों का दर्द उनकी जुबानी और इन प्रदर्शनों में साफ झलकता है। छात्रों का कहना है, "हमने अपनी जवानी और परिवार की गाढ़ी कमाई इस देश को संवारने में लगा दी। हमने नियमों का पालन करते हुए अपनी पढ़ाई पूरी की, लेकिन अब सिस्टम हमें बिना किसी पुख्ता वजह के बाहर का रास्ता दिखा रहा है। हमारे पास न तो घर लौटने का मुंह है और न ही यहाँ टिकने का कोई कानूनी जरिया। हमारा भविष्य पूरी तरह से अधर में लटक गया है।"
अपनी आवाज़ हुक्मरानों तक पहुँचाने के लिए छात्र शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के साथ-साथ भूख हड़ताल जैसे कड़े कदम उठाने को भी मजबूर हुए हैं। उनका यह दर्द सिर्फ एक प्रशासनिक गलती या वीज़ा रद्दीकरण का मामला नहीं है, बल्कि यह उन अनगिनत मध्यमवर्गीय परिवारों की उम्मीदों का टूटना है, जिन्होंने अपने बच्चों को विदेश भेजने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था।
दूसरी ओर, पोर्टेज कॉलेज जैसे शिक्षण संस्थान और इमिग्रेशन विभाग अपने नियमों और प्रक्रियाओं का हवाला देकर पल्ला झाड़ते नज़र आ रहे हैं। प्रशासन का कहना है कि वर्क परमिट तयशुदा और पात्र कार्यक्रमों के आधार पर ही दिए जाते हैं। हालांकि, कॉलेज प्रशासन और छात्र प्रतिनिधियों के बीच बैठकों का दौर जारी है, और छात्र कानूनी विकल्पों के ज़रिए अपने फैसलों पर पुनर्विचार की गुहार लगा रहे हैं।
फिलहाल, कनाडा में रह रहे इन भारतीय छात्रों का हर एक दिन तनाव और अनिश्चितता के साए में बीत रहा है। आँखों में आंसू, दिल में भारी निराशा और हाथों में तख्तियां थामे ये छात्र सिर्फ एक ही सवाल पूछ रहे हैं— "अगर हमारी गलती नहीं है, तो हमारे सपनों की यह सज़ा क्यों?" अब देखना यह होगा कि कनाडाई सरकार इन युवाओं के दर्द को समझकर कोई मानवीय राहत देती है या इनके अरमान ठंडे बस्ते में चले जाते हैं।
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