उत्तराखंड की बेटी अंकिता भंडारी की त्रासदी ने न केवल देवभूमि की आत्मा को झकझोर कर रख दिया था, बल्कि सत्ता और रसूख के गठजोड़ पर भी गहरे सवाल खड़े किए थे। पौड़ी गढ़वाल के डोभ गांव की उस उन्नीस साल की मासूम की यादों को सहेजने की दिशा में सरकार ने अब एक औपचारिक कदम उठाया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश के बाद प्रदेश के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग ने श्रीकोट स्थित राजकीय नर्सिंग कॉलेज का नामकरण 'स्वर्गीय अंकिता भंडारी राजकीय नर्सिंग कॉलेज' के रूप में कर दिया है। यह फैसला महज एक नाम का परिवर्तन नहीं है, बल्कि उस बेटी के अस्तित्व को स्वीकार करने की कोशिश है जिसकी आवाज को रिजॉर्ट की दीवारों और नहर की गहराई में दबाने का प्रयास किया गया था। शासन द्वारा जारी यह आदेश उस संघर्ष की याद दिलाता है जो एक गरीब परिवार ने अपनी संतान को इंसाफ दिलाने के लिए शुरू किया था। सचिव डॉ. आर. राजेश कुमार द्वारा जारी इस आधिकारिक अधिसूचना ने भले ही कॉलेज के गेट पर एक नया नाम लिख दिया हो, लेकिन डोभ की गलियों से लेकर देहरादून के सचिवालय तक न्याय की गूँज अभी थमी नहीं है।

सियासी गलियारों में वीआईपी का खौफ और सीबीआई की मांग

मुख्यमंत्री धामी ने अंकिता के माता-पिता से मुलाकात कर उन्हें यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया कि सरकार उनके साथ चट्टान की तरह खड़ी है। इस मुलाकात के दौरान भावनात्मक पल भी आए और तीखे सवाल भी। मुख्यमंत्री ने साफ तौर पर कहा कि अंकिता को न्याय दिलाना उनकी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है और इसके लिए विधि-सम्मत तथा निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित की जा रही है। हालांकि, इस आश्वासन के बावजूद उत्तराखंड की हवाओं में एक अनकहा डर और आक्रोश तैर रहा है। वह 'वीआईपी' कौन था जिसके लिए अंकिता पर दबाव बनाया गया था, यह सवाल आज भी अनुत्तरित है। कांग्रेस और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने इस मुद्दे को लेकर सड़कों पर मोर्चा खोल रखा है। अंकिता के माता-पिता ने भी अपनी मांग को दोहराते हुए साफ किया है कि जब तक मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सीबीआई को नहीं सौंपी जाती, तब तक सच की पूरी परतें नहीं खुलेंगी। यह मांग अब एक जन-आंदोलन का रूप ले चुकी है, जो केवल सजा तक सीमित नहीं है बल्कि उस सिस्टम के चेहरे को बेनकाब करना चाहती है जो अपराधियों को संरक्षण देता है।

वनंत्रा की वो काली रात और अधूरा इंसाफ

सितंबर 2022 की वह रात उत्तराखंड के इतिहास में एक काले धब्बे की तरह दर्ज है। वनंत्रा रिजॉर्ट में बतौर रिसेप्शनिस्ट काम करने वाली अंकिता को पुलकित आर्य और उसके साथियों ने मौत के घाट उतार दिया था। सत्र न्यायालय ने मुख्य आरोपी पुलकित आर्य और उसके दो सहयोगियों को उम्रकैद की सजा सुनाकर कानूनी प्रक्रिया का एक पड़ाव तो पूरा कर दिया, लेकिन क्या यह पूर्ण न्याय है? अंकिता के परिजनों का मानना है कि हत्या के पीछे की असल साजिश और उन रसूखदार चेहरों का सामने आना अभी बाकी है जो पर्दे के पीछे से खेल रहे थे। कॉलेज का नामकरण एक प्रतीकात्मक जीत जरूर हो सकती है, लेकिन यह उस दर्द का मरहम नहीं बन सकती जो एक मां-बाप अपनी बेटी को खोकर सह रहे हैं। देवभूमि की जनता आज भी यह पूछ रही है कि क्या एक नाम बदल देने से व्यवस्था की खामियां सुधर जाएंगी? क्या आने वाली पीढ़ियां इस कॉलेज में पढ़ते हुए अंकिता के बलिदान को केवल एक नाम के रूप में देखेंगी या फिर उस संघर्ष के प्रतीक के तौर पर, जिसने सत्ता को झुकने पर मजबूर कर दिया था? न्याय की यह मशाल तब तक जलती रहेगी जब तक वीआईपी संस्कृति का अंत नहीं हो जाता।


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