उत्तराखंड में अवैध निर्माण और मजहबी अतिक्रमण के लिए कोई स्थान शेष नहीं बचा है। मुख्यमंत्री के कड़े तेवरों और शासन के स्पष्ट आदेशों का पालन करते हुए जिला प्रशासन एवं मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण ने संयुक्त रूप से एक ऐसी कार्रवाई को अंजाम दिया है जिसने शहर के भू-माफियाओं और अवैध कब्जाधारियों की नींद उड़ा दी है। शहर के हृदय स्थल कहे जाने वाले घंटाघर के पास स्थित डिस्पेंसरी रोड पर वर्षों से सरकारी जमीन पर कुंडली मारकर बैठे अवैध ढांचे को गुरुवार की काली रात में नेस्तनाबूद कर दिया गया। यह महज एक ढांचे का गिरना नहीं है बल्कि उन ताकतों को कड़ा संदेश है जो सार्वजनिक संपत्तियों को अपनी निजी जागीर समझकर वहां मजहबी चोले की आड़ में कब्जा जमा लेती हैं। शासन ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि देवभूमि की पवित्रता और सरकारी संसाधनों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

गोपनीयता और रफ्तार: प्रशासन की 'सर्जिकल स्ट्राइक'

घंटाघर क्षेत्र में हुई इस ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की सबसे बड़ी विशेषता इसकी गोपनीयता और बिजली जैसी तेजी रही। आमतौर पर इस तरह की कार्रवाइयों से पहले सूचनाएं लीक हो जाती हैं जिससे अराजक तत्वों को भीड़ जुटाने और बाधा डालने का समय मिल जाता है। लेकिन इस बार एमडीडीए की प्रवर्तन टीम और पुलिस प्रशासन ने एक अचूक रणनीति तैयार की थी। जब पूरा शहर गहरी नींद में सो रहा था तब प्रशासन की गाड़ियां और बुलडोजर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहे थे। एचएनबी कॉम्प्लेक्स परिसर में बनी इस मजार को हटाने के लिए जो समय चुना गया वह कानून व्यवस्था की स्थिति को नियंत्रित रखने की दृष्टि से मास्टरस्ट्रोक साबित हुआ। अतिक्रमणकारियों को यह सोचने और समझने का मौका तक नहीं मिला कि वे विरोध दर्ज करा सकें या कोई हंगामा खड़ा कर सकें। मौके पर मौजूद भारी पुलिस बल और पीएसी के जवानों ने पूरे इलाके को छावनी में तब्दील कर दिया था जिससे विरोध की कोई भी गुंजाइश खत्म हो गई।

कागजों की कमी और सात दिन की मोहलत

यह कार्रवाई कोई जल्दबाजी में लिया गया निर्णय नहीं थी बल्कि एक लंबी कानूनी प्रक्रिया का अंतिम चरण थी। एमडीडीए ने पूर्व में ही मजार प्रबंधन को स्पष्ट नोटिस जारी किया था जिसमें उनसे इस निर्माण के स्वामित्व और भूमि से संबंधित वैध दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा गया था। विडंबना यह है कि सात दिनों की पर्याप्त मोहलत मिलने के बावजूद प्रबंधन की ओर से कोई भी ऐसा संतोषजनक साक्ष्य पेश नहीं किया गया जो यह सिद्ध कर सके कि वह निर्माण वैध था। सरकारी रिकॉर्ड में वह भूमि डिस्पेंसरी रोड की सार्वजनिक संपत्ति के रूप में दर्ज थी जिस पर अवैध तरीके से ढांचे का विस्तार किया गया था। जब दस्तावेजों की कसौटी पर दावे खोखले साबित हुए तो कानून का डंडा चलना निश्चित था। प्राधिकरण ने साफ कर दिया है कि नोटिस की अवधि समाप्त होने के बाद किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं होगा और बुलडोजर ही अंतिम समाधान बनकर उभरेगा।

सुरक्षा और यातायात के लिए नासूर बना अतिक्रमण

घंटाघर क्षेत्र देहरादून का सबसे व्यस्त और संवेदनशील व्यापारिक केंद्र है। यहाँ स्थित अवैध मजार न केवल सार्वजनिक सुविधाओं के विस्तार में एक बड़ी बाधा बनी हुई थी बल्कि सुरक्षा की दृष्टि से भी एक बड़ा खतरा मानी जा रही थी। व्यस्ततम समय में यहाँ श्रद्धालुओं की भीड़ और अवैध फैलाव के कारण यातायात व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाती थी। आपातकालीन परिस्थितियों में एम्बुलेंस या फायर ब्रिगेड की गाड़ियों का निकलना भी दूभर हो जाता था। स्थानीय नागरिकों और व्यापारियों द्वारा लंबे समय से इस दिशा में कार्रवाई की मांग की जा रही थी। प्रशासन ने इस संवेदनशील मुद्दे को गहराई से समझा और यह निष्कर्ष निकाला कि जनहित और शहर की सुरक्षा सर्वोपरि है। किसी भी धार्मिक प्रतीक की आड़ में कानून की अवहेलना को अब और अधिक समय तक ढिलाई नहीं दी जा सकती थी।


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कड़ा संदेश: देवभूमि में नहीं चलेगा 'लैंड जिहाद'

देहरादून की इस कार्रवाई ने पूरे राज्य में एक नई बहस और चेतना को जन्म दिया है। उत्तराखंड सरकार वर्तमान में पूरे प्रदेश में उन अवैध धार्मिक ढांचों की पहचान कर रही है जो वन भूमि या नजूल भूमि पर बिना किसी अनुमति के खड़े किए गए हैं। घंटाघर की यह कार्रवाई महज एक शुरुआत मानी जा रही है। जिला मजिस्ट्रेट और एमडीडीए के आला अधिकारियों ने मौके पर स्वयं खड़े होकर यह सुनिश्चित किया कि ध्वस्तीकरण के बाद सारा मलबा हटा लिया जाए ताकि सुबह होने तक यातायात सामान्य हो सके। यह कार्यसंस्कृति बदलती हुई व्यवस्था का प्रतीक है जहां अब तुष्टीकरण की राजनीति के बजाय कानून के शासन को प्राथमिकता दी जा रही है। इस ध्वस्तीकरण से यह स्पष्ट हो गया है कि सरकारी जमीन पर अतिक्रमण चाहे किसी भी स्वरूप में हो या किसी भी मजहब से जुड़ा हो उसे अंततः कानून के बुलडोजर का सामना करना ही पड़ेगा।

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