दुनिया जब नए साल के स्वागत में आतिशबाजी और संगीत के शोर में डूबी थी, उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल की सर्द हवाओं में एक अलग तरह की तपिश महसूस की जा रही थी। यह तपिश उन मोमबत्तियों की थी जो अंकिता भंडारी के लिए न्याय की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों के हाथों में जल रही थीं। साल बदल गया है, तारीखें बदल गई हैं, लेकिन देवभूमि के सीने में दबा वह सवाल आज भी जस का तस खड़ा है कि उस रात वनंतरा रिजॉर्ट में आखिर वह रसूखदार 'वीआईपी' कौन था जिसके लिए एक उन्नीस साल की बेटी की जिंदगी का सौदा करने की कोशिश की गई। पौड़ी की सड़कों पर उमड़ा यह हुजूम केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था को आईना दिखाने की कोशिश है जिसने अब तक उस कथित रसूखदार चेहरे के नाम से पर्दा नहीं उठाया है।
इंसाफ की धीमी रफ्तार और गहराता आक्रोश
अंकिता भंडारी हत्याकांड ने न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया था। ऋषिकेश के चिल्ला नहर से अंकिता का शव मिलने के बाद जो जनआक्रोश भड़का था, वह आज भी कम नहीं हुआ है। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि मुख्य आरोपियों की गिरफ्तारी के बावजूद जांच की सुई उस बिंदु पर जाकर ठिठक गई है, जहाँ से सत्ता और रसूख के गलियारे शुरू होते हैं। नए साल की पूर्व संध्या पर निकाला गया यह कैंडल मार्च साफ संदेश देता है कि पहाड़ की जनता इस मामले को ठंडे बस्ते में जाने देने के मूड में नहीं है। लोगों के मन में यह आशंका घर कर गई है कि कहीं साक्ष्यों के अभाव या प्रभावशाली दबाव के चलते असल मास्टरमाइंड बच न निकले।
वीआईपी गेस्ट का रहस्य और मिटते निशान
इस पूरे घटनाक्रम में 'वीआईपी' शब्द एक ऐसा रहस्य बन चुका है जिसे सुलझाने में जांच एजेंसियां अब तक नाकाम रही हैं। अंकिता के अंतिम संदेशों में जिस विशेष अतिथि को 'एक्स्ट्रा सर्विस' देने के दबाव का जिक्र था, उसी का नाम जानने के लिए पूरा राज्य आंदोलित है। घटना के तुरंत बाद जिस तरह से रिजॉर्ट के महत्वपूर्ण हिस्सों पर बुलडोजर चलाया गया, उसने शुरू से ही जांच की निष्पक्षता पर सवालिया निशान लगा दिए थे। स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि वह बुलडोजर अवैध निर्माण गिराने के लिए नहीं, बल्कि उन साक्ष्यों को मिटाने के लिए चला था जो किसी बड़े चेहरे की संलिप्तता को उजागर कर सकते थे। आज की रात भी पौड़ी की जनता उसी चेहरे को बेनकाब करने की मांग दोहरा रही है।
व्यवस्था की जवाबदेही और भविष्य की चुनौतियां
जैसे-जैसे समय बीत रहा है, इस मामले में कानूनी पेचीदगियां बढ़ती जा रही हैं। आरोपियों के नार्को टेस्ट को लेकर जारी खींचतान और गवाहों की सुरक्षा को लेकर उठते सवाल न्याय प्रणाली की साख को चुनौती दे रहे हैं। उत्तराखंड के शांत पहाड़ों में उभरी यह चीख दरअसल उस असुरक्षा की भावना का परिणाम है जो राज्य की बेटियों के मन में घर कर रही है। नए साल का सूरज शायद नई उम्मीदें लेकर आए, लेकिन पौड़ी के इन प्रदर्शनकारियों के लिए नया साल तभी सार्थक होगा जब अंकिता के हत्यारों और उनके संरक्षकों को उनके अंजाम तक पहुंचाया जाएगा। यह लड़ाई अब केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि उस हर नागरिक की है जो सत्ता के अहंकार के खिलाफ इंसाफ की ताकत पर यकीन रखता है।
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