उत्तराखंड की राजनीति में इस वक्त एक वीडियो ने ऐसा तूफान खड़ा कर दिया है जिसकी गूँज दिल्ली तक सुनाई दे रही है। यह वायरल वीडियो प्रदेश की महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास मंत्री रेखा आर्या के पति गिरधारी लाल साहू का बताया जा रहा है। अल्मोड़ा के स्याही देवी इलाके में एक बैठक के दौरान उन्होंने कुछ ऐसा कह दिया जिससे न सिर्फ महिलाओं का अपमान हुआ है, बल्कि पूरी सरकार की साख पर गहरा बट्टा लग गया है। हालांकि उत्तराखण्ड तहलका इस वायरल वीडियो की पुष्टि नहीं करता है। एक तरफ उत्तराखंड आज भी अंकिता भंडारी जैसे संवेदनशील मामलों को लेकर आक्रोशित है और सड़कों पर न्याय की गुहार लगा रहा है, वहीं दूसरी तरफ सत्ता के गलियारों के इतने करीब बैठे लोगों की ऐसी भाषा ने जलती आग में घी डालने का काम किया है। देवभूमि की जनता आज शासन से यह सवाल पूछ रही है कि क्या बेटियों के सम्मान को अब चंद रुपयों के तराजू में तोला जाएगा?
क्या है वीडियो का पूरा सच और कड़वी बातें
इस विवाद की जड़ें 23 दिसंबर 2025 को हुई एक बैठक से जुड़ी हैं। सोशल मीडिया पर तेज़ी से प्रसारित हो रहे वीडियो के दृश्यों में गिरधारी लाल साहू कुछ कुंवारे युवाओं के साथ हंसी-ठिठोली करते और संवाद करते नजर आ रहे हैं। इस बातचीत के दौरान वे युवाओं को जल्दी विवाह के बंधन में बंधने की सलाह दे रहे हैं और हंसी के पात्र के रूप में पुराने दौर का उदाहरण दे रहे हैं कि कैसे उस उम्र तक लोग कई बच्चों के पिता बन जाते थे। लेकिन यह हंसी-मजाक तब एक बेहद शर्मनाक मोड़ ले लेता है जब वे एक पड़ोसी राज्य का नाम लेते हुए कथित तौर पर यह कहते सुने जाते हैं कि वहां से विवाह के लिए मात्र 20 से 25 हजार रुपये के खर्च में 'युवतियां उपलब्ध' हो जाती हैं। जैसे ही यह वीडियो सार्वजनिक हुआ, इंटरनेट पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। किसी भी सभ्य और आधुनिक समाज में महिलाओं को इस तरह एक 'कमोडिटी' या 'बाजारू वस्तु' के तौर पर पेश करना न केवल अनैतिक है बल्कि यह एक अपराधी मानसिकता को भी दर्शाता है।
विपक्ष का कड़ा प्रहार और नैतिकता पर उठते सवाल
कांग्रेस ने इस मुद्दे को एक बड़े राजनैतिक हथियार के रूप में लपक लिया है और सरकार की नीयत पर सीधे प्रहार किए हैं। महिला कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष ज्योति रौतेला ने इस बयान को उत्तराखंड के इतिहास का एक काला अध्याय और देश की आधी आबादी का घोर अपमान करार दिया है। उनका तर्क सीधा और स्पष्ट है—जब एक ऐसे रसूखदार परिवार से इस तरह की भाषा निकलती है, जिसके कंधों पर प्रदेश की लाखों लाड़ली बेटियों और महिलाओं के उत्थान की जिम्मेदारी है, तो यह शासन की असली मानसिकता को उजागर करता है। विपक्ष का आरोप है कि 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' का नारा देने वाली भाजपा सरकार के भीतर महिलाओं के प्रति सम्मान का जो मुखौटा है, वह अब उतर चुका है। यह मामला अब सिर्फ एक व्यक्तिगत टिप्पणी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसे सीधे तौर पर 'वीवीआईपी कल्चर' के अहंकार और महिला सुरक्षा की गंभीर चुनौती से जोड़कर देखा जा रहा है।
सफाई में क्या बोले गिरधारी लाल साहू
विवाद के तूल पकड़ते ही और चौतरफा घिरने के बाद गिरधारी लाल साहू ने रक्षात्मक रुख अपनाते हुए अपनी स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की है। उन्होंने सोशल मीडिया और विभिन्न संचार माध्यमों से इस वीडियो को भ्रामक और 'टैम्पर' किया हुआ बताया है। साहू का दावा है कि उनके बयान का गलत अर्थ निकाला जा रहा है। उनका तर्क है कि जिस 20-25 हजार की राशि का उन्होंने उल्लेख किया था, वह किसी महिला का मूल्य नहीं बल्कि एक अत्यंत साधारण विवाह समारोह को आयोजित करने का न्यूनतम खर्च था। उन्होंने अपने स्पष्टीकरण में यह भी जोड़ा कि यह सब उनकी और उनकी मंत्री पत्नी रेखा आर्या की राजनीतिक छवि को धूमिल करने की एक सोची-समझी साजिश है। हालांकि, विपक्षी दल और जागरूक सामाजिक संगठन इस सफाई को स्वीकार करने के मूड में बिल्कुल नहीं दिख रहे हैं। उनका कहना है कि वीडियो में इस्तेमाल किए गए शब्द 'मिल जाती हैं' और 'उपलब्ध' साफ तौर पर एक खास नजरिये को बयां कर रहे हैं।
गरीबी का उपहास और विकास के दावों की पोल
इस पूरे प्रकरण ने एक और कड़वा और राजनैतिक सवाल खड़ा कर दिया है। जिस पड़ोसी राज्य का जिक्र इस विवादित वीडियो में 20-25 हजार में लड़कियां मिलने के संदर्भ में किया जा रहा है, वहां पिछले लगभग डेढ़ दशक से भाजपा समर्थित सरकार का शासन है। यह वही सरकार है जो उस राज्य की गरीबी और पिछड़ेपन को खत्म करने के वादे के साथ सत्ता में आई थी। यदि पंद्रह सालों के शासन के बाद भी वहां के हालात ऐसे हैं कि लोग गरीबी के कारण अपनी बेटियों के रिश्तों को एक 'सस्ते सौदे' की तरह देखते हैं या बाहरी लोग वहां की गरीबी का ऐसा मजाक उड़ाते हैं, तो यह उस पूरे विकास मॉडल की विफलता है। यह बेहद शर्मनाक है कि विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच आज भी महिलाओं की स्थिति को इतना कमजोर समझा जा रहा है कि उनके विवाह और अस्तित्व को चंद हजार रुपयों के खर्च में समेटा जा रहा है।
सत्ता के गलियारों में सन्नाटा और साख की लड़ाई
वर्तमान में उत्तराखंड की राजनीति में यह चर्चा का सबसे संवेदनशील और गरमाया हुआ विषय बन गया है। जहाँ एक तरफ भाजपा इस मामले में रक्षात्मक मुद्रा अपनाए हुए है और इसे व्यक्तिगत टिप्पणी बताकर पल्ला झाड़ रही है, वहीं दूसरी तरफ आम जनता में इस बात को लेकर गहरा आक्रोश है कि क्या सार्वजनिक जीवन में सक्रिय लोगों को भाषा की मर्यादा का न्यूनतम ज्ञान भी नहीं है? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद आने वाले समय में रेखा आर्या के विभाग और उनकी अपनी राजनीतिक साख के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। उत्तराखंड का युवा, जो पहले से ही बेरोजगारी और अंकिता भंडारी जैसे केस में 'वीवीआईपी' के हस्तक्षेप से परेशान है, वह अब ऐसे बयानों को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। अब सबकी नजरें मुख्यमंत्री और संगठन पर टिकी हैं कि क्या इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई होगी या फिर हमेशा की तरह इसे भी समय की धूल में दबा दिया जाएगा।
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