- सत्ता के गलियारों से दूर पहाड़ की पगडंडियों पर न्याय का नया सवेरा
- उत्तराखंड में धामी का 'धरातल टेस्ट' सफल
- जन-के-द्वार: उत्तराखंड में सुशासन के 'ग्राउंड टेस्ट' से मिली बड़ी राहत
- धामी सरकार का मास्टरस्ट्रोक: घर बैठे समाधान से जनता में भारी उत्साह
उत्तराखंड की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में अक्सर सरकारी योजनाएं फाइलों के बोझ तले दबकर दम तोड़ देती थीं लेकिन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के विजन ने इस धारणा को जड़ से उखाड़ फेंका है। 'जन-सरकार, जन-के-द्वार' कार्यक्रम महज एक सरकारी आयोजन नहीं बल्कि प्रशासनिक तंत्र के लिए एक कड़ी चुनौती है जिसमें अफसरों को अपने वातानुकूलित दफ्तर छोड़कर जनता के बीच सीधे जवाबदेह होना पड़ रहा है। इस कार्यक्रम के जरिए मुख्यमंत्री ने यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि सरकार जनता के लिए है और जनता के प्रति उसकी जवाबदेही ही लोकतंत्र की असली कसौटी है। आज राज्य का दूरस्थ गांव हो या दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र प्रशासन खुद चलकर नागरिक के पास जा रहा है जिससे दशकों से चली आ रही 'दफ्तर दर दफ्तर' भटकने वाली संस्कृति का अंत हो रहा है।
आंकड़ों की गवाही और बिचौलियों के तंत्र पर होता कड़ा प्रहार
हालिया प्रगति रिपोर्ट इस बात की तस्दीक करती है कि राज्य सरकार केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं है बल्कि धरातल पर उसकी पकड़ बेहद मजबूत हो चुकी है। अब तक प्रदेश के सभी जिलों में आयोजित सैकड़ों शिविरों में लाखों लोगों की भागीदारी यह बताने के लिए काफी है कि आम जनमानस ने इस पहल को पूरे विश्वास के साथ स्वीकार किया है। सबसे बड़ी चोट उन बिचौलियों और भ्रष्टाचार के सिंडिकेट पर पड़ी है जो सरकारी सेवाओं और आम आदमी के बीच दीवार बनकर खड़े रहते थे। हजारों की संख्या में आए प्रार्थना पत्रों का जिस रफ्तार से निस्तारण हुआ है वह राज्य की प्रशासनिक कार्यक्षमता में आए क्रांतिकारी बदलाव का जीवंत प्रमाण है। यह आंकड़े केवल कागजी संख्या नहीं बल्कि उन हजारों चेहरों की मुस्कान है जिन्हें सालों से लंबित अपने प्रमाण पत्र और हक की पेंशन घर बैठे प्राप्त हुई है।
निर्णायक नेतृत्व और जवाबदेह ब्यूरोक्रेसी का नया 'उत्तराखंड मॉडल'
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस अभियान की सफलता के लिए शुरू से ही बेहद सख्त और स्पष्ट रुख अपनाया है। उन्होंने साफ कर दिया है कि समस्याओं को टालने की पुरानी आदत अब नहीं चलेगी। शिविरों में निर्णय लेने में सक्षम अधिकारियों की अनिवार्य उपस्थिति ने उस रेड-टेपिज्म को खत्म कर दिया है जो फाइलों को महीनों तक लटकाए रखती थी। धामी सरकार का यह मॉडल विश्वास और समाधान के दो स्तंभों पर टिका है। इसमें न केवल शिकायतों को सुना जा रहा है बल्कि उनकी निरंतर मॉनिटरिंग कर यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि कोई भी पात्र व्यक्ति वंचित न रहे। वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगों और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को दी गई प्राथमिकता ने प्रशासन को मानवीय चेहरा दिया है जो उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य के लिए अनिवार्य था।
भविष्य की ओर बढ़ता उत्तराखंड और अटूट जनविश्वास
इस व्यापक अभियान ने जनता के भीतर सरकार के प्रति एक नया भरोसा पैदा किया है। मुख्यमंत्री का यह कहना कि 'लोकतंत्र तब सशक्त होता है जब सरकार जनता तक पहुँचे' अब धरातल पर साकार होता दिख रहा है। यह कार्यक्रम उत्तराखंड के विकास पथ पर एक मील का पत्थर साबित हो रहा है क्योंकि इसने सीधे संवाद की एक ऐसी संस्कृति विकसित कर दी है जहाँ भ्रष्टाचार और लापरवाही के लिए कोई स्थान नहीं है। जिस प्रकार से योजनाओं का लाभ बिना किसी बाधा के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक पहुँच रहा है वह आने वाले समय में राज्य के कल्याणकारी स्वरूप को और अधिक निखारेगा। जन-सरकार का यह द्वार अब राज्य की नई पहचान बन चुका है जो भविष्य की प्रगति का मार्ग प्रशस्त कर रहा है।
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