उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले के रुद्रपुर के रामलीला मैदान में पिछले दो दिनों से जमा बंगाली समाज के लोगों का यह धरना सिर्फ किसी नई मांग को लेकर नहीं है, बल्कि इसके पीछे तीन पीढ़ियों से चला आ रहा वह दर्द है जो समय के साथ कम होने के बजाय और गहराता जा रहा है। वर्ष 1947 के विभाजन और फिर 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान अपना सब कुछ छोड़कर आए हजारों परिवारों को उस समय की सरकारों ने तराई के इस इलाके में बसाया था। उस दौर में दलदली जमीन और घने जंगलों को अपनी मेहनत से खेती योग्य बनाने वाले इन परिवारों की आज तीसरी और चौथी पीढ़ी अपने ही देश में अपनी पहचान, हक और वजूद के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर है।

​इस पूरे असंतोष और आंदोलन के केंद्र में जातिगत पहचान और संवैधानिक अधिकारों का सवाल है। पश्चिम बंगाल में नमोशूद्र और अन्य बंगाली समुदायों को अनुसूचित जाति यानी एससी का दर्जा मिला हुआ है, लेकिन उत्तराखंड में बसने के बाद उन्हें यह अधिकार नहीं मिल पा रहा। जाति प्रमाण पत्र और आरक्षण का लाभ न मिलने से बंगाली समाज की नई पीढ़ी खुद को शिक्षा, सरकारी नौकरियों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में काफी पीछे महसूस कर रही है। जब युवा अपनी काबिलियत के बावजूद अवसरों से वंचित रह जाते हैं, तो पूरे समाज में एक गहरे असंतोष का पनपना स्वाभाविक है। यह समस्या सिर्फ कागजी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने युवाओं के भविष्य और उनके सपनों पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।

​पहचान के इस संकट के साथ-साथ जमीनों के मालिकाना हक का मुद्दा भी इस समाज की रातों की नींद उड़ाए हुए है। विस्थापन के समय जो जमीनें इन परिवारों को रहने और खेती करने के लिए दी गई थीं, उनमें से बहुत सी जमीनों का आज तक पूर्ण फ्री-होल्ड या रजिस्ट्री अधिकार इन्हें नहीं मिला है। जमीन का पक्का कागज न होने की वजह से न तो उन्हें बैंकों से आसानी से लोन मिल पाता है और न ही वे अपनी ही संपत्ति पर पूरा अधिकार महसूस कर पाते हैं। इसके अलावा, अपनी भाषा और संस्कृति को बचाए रखने की जंग भी जारी है। स्थानीय स्कूलों में बांग्ला भाषा की पढ़ाई और बंगाली शिक्षकों की नियुक्ति जैसी मांगें सालों से फाइलों में धूल फांक रही हैं, जिससे अपनी जड़ों से कटने का डर इस समाज को लगातार सता रहा है।

​हालांकि, यह भी सच है कि राज्य सरकार ने अतीत में समाज की एक बड़ी मानसिक पीड़ा को दूर करने की दिशा में कदम उठाया था। जाति प्रमाण पत्रों से 'पूर्व पाकिस्तानी' जैसे अपमानजनक शब्द को हटाकर सरकार ने एक बड़ी राहत दी थी, जिसकी सराहना भी हुई। लेकिन प्रदर्शन कर रहे लोगों का साफ कहना है कि वह केवल एक प्रतीकात्मक शुरुआत थी और जब तक उन्हें वास्तविक अधिकार नहीं मिल जाते, तब तक उनकी लड़ाई अधूरी है। दुनिया भर में विस्थापित समुदायों के पुनर्वास का इतिहास यही सिखाता है कि किसी भी समाज को केवल जमीन का एक टुकड़ा दे देना ही पुनर्वास नहीं कहलाता, बल्कि उन्हें मुख्यधारा में शामिल कर समान अधिकार और सम्मान देना ही सच्चा पुनर्वास होता है।


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​इस पूरी स्थिति को सुलझाने के लिए सरकार और प्रशासन को संवेदनशील और व्यावहारिक रवैया अपनाना होगा। केवल आश्वासन देने या धरने को प्रशासनिक नजरिए से देखने के बजाय एक उच्च स्तरीय कमेटी बनाकर बंगाली समाज के प्रतिनिधियों के साथ सीधी बातचीत की जानी चाहिए। अनुसूचित जाति के दर्जे के कानूनी पहलुओं का त्वरित समाधान ढूंढने के साथ-साथ जमीनों को फ्री-होल्ड करने की प्रक्रिया को पारदर्शी और आसान बनाया जाना जरूरी है। तीन पीढ़ियों का यह इंतजार अब खत्म होना चाहिए ताकि यह समाज पूरी गरिमा और अधिकार के साथ देश के विकास में अपना योगदान दे सके।

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