बीते दिनों बैंकों में हुई एक दिन की देशव्यापी हड़ताल ने देश में “सात दिन काम” की संस्कृति से जुड़े एक बेहद संवेदनशील सवाल को दोबारा सतह पर ला दिया है। अब हफ्ते में पांच दिन काम की मांग अब केवल बैंकों तक सीमित नहीं रही, बल्कि कई अन्य सरकारी और गैर-सरकारी क्षेत्रों में भी इसकी मांग शुरू हो चुकी है। जिस तरह से बीते 10 सालों में काम करने का तरीका बदला है, उसने कर्मचारियों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाला है। सुबह से देर शाम तक काम की आपाधापी, लगातार बढ़ता टारगेट और निजी जीवन के लिए समय न मिल पाना एक आम परेशानी बन चुका है। ऐसे में हफ्ते में दो दिन की छुट्टी कर्मचारियों को दिमागी रूप से तरोताजा करने और उनके पारिवारिक जीवन में संतुलन बनाने के लिए बहुत जरूरी महसूस होता है।

​अगर दुनिया के अन्य विकसित देशों और अंतरराष्ट्रीय मानकों को देखें तो पांच दिन काम का नियम कोई अनोखी मांग नहीं लगती। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और यूरोप के कई देशों में यह व्यवस्था सालों से लागू है। यूरोप के कई देशों में तो अब तो चार दिन काम का नियम प्रयोग किया जा रहा है। खुद हमारे देश में रिजर्व बैंक, जीवन बीमा निगम, कॉरपोरेट जगत और अधिकांश आईटी कंपनियों में फाइव डे वर्किंग लागू है। जब देश का एक बड़ा वर्ग इस व्यवस्था का लाभ उठा रहा है और उनकी कार्य क्षमता में सुधार देखा गया है, तो बाकी बैंकिंग और सार्वजनिक सेवाओं के कर्मचारियों का तनाव मुक्त होकर बेहतर सेवा देने का तर्क भी पूरी तरह जायज नजर आता है।

​काम के दिनों में बदलाव की यह बहस अब केवल दफ्तरों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि अब स्कूलों में भी पांच दिन की पढ़ाई का मुद्दा जोर पकड़ने लगा है। हफ्ते में दो दिन की छुट्टी मिलने से छोटे बच्चों को भी सहूलियत मिलेगी। उन पर पढ़ाई का भारी दिमागी बोझ कम होगा और उन्हें खेलने कूदने, अपनी हॉबी को निखारने व परिवार के साथ समय बिताने का मौका मिलेगा। इससे टीचर्स को भी सिलेबस तैयार करने और कॉपियां जांचने के लिए पूरा समय मिल सकेगा। देश के राज्य पंजाब में सरकारी व गैर सरकारी स्कूलों में “फाइव डे वर्किंग” का नियम लागू है। उत्तराखंड समेत देश के कई अन्य राज्यों में भी कुछ स्कूल इस नियम को अपना रहे हैं। हालांकि, इसके लिए जो चुनौती सामने आ रही है वह कम दिनों में सारा सिलेबस पूरा कराने के लिए रोजाना स्कूल के घंटों को थोड़ा बदलाव करने की आ रही है। जिससे छोटे बच्चों को दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। 

​इसके साथ ही इसका दूसरा पहलू यह है कि भारत एक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। जहां की एक बड़ी आबादी आज भी बैंक जाकर काम निपटाना पसंद करती है। खासकर छोटे व्यापारी, किसान और बुजुर्ग नागरिक अपनी नगद निकासी, ड्राफ्ट या पासबुक एंट्री के लिए बैंक कर्मचारियों पर निर्भर हैं। यदि हफ्ते में दो दिन बैंक बंद रहते हैं, तो सोमवार को बैंकों में भीड़ का भारी दबाव बनेगा, जिससे लेनदेन और चेक क्लीयरेंस में देरी हो सकती है। सरकार और बैंक प्रबंधन की सबसे बड़ी चिंता यही है कि इस फैसले से देश की आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार धीमी न पड़ जाए और आम जनता को असुविधा का सामना न करना पड़े।


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​सरकार की मंशा की बात करें तो ऐसा नहीं है कि वह इस मांग के पूरी तरह खिलाफ है। सरकार और भारतीय बैंक संघ के बीच पांच दिन काम कराने को लेकर सहमति की खबरें पहले भी आ चुकी हैं, लेकिन असली पेंच इसके बदले काम के घंटों को बढ़ाने पर फंसा हुआ है। प्रस्ताव यह है कि शनिवार की छुट्टी के बदले सोमवार से शुक्रवार तक रोजाना लगभग पैंतालीस मिनट एक्स्ट्रा काम किया जाए। इसके अलावा सरकार चाहती है कि इस नियम को लागू करने से पहले डिजिटल बैंकिंग और एटीएम व्यवस्था को इतना मजबूत और आसान बना दिया जाए कि आम जनता को बैंक बंद होने का अहसास ही न हो।

​कुल मिलाकर, हफ्ते में पांच दिन काम करने की मांग समय के हिसाब से जरूरी महसूस हो रही है। एक स्वस्थ, खुशहाल और तनावमुक्त कर्मचारी व विद्यार्थी ही किसी संस्थान और समाज को बेहतर परिणाम दे सकते हैं। हालांकि, इसे लागू करते समय सरकार, प्रबंधन और शिक्षाविदों को आपस में मिलकर बीच का रास्ता निकालना होगा। कर्मचारियों व बच्चों के कल्याण और आम नागरिकों की सहूलियत दोनों के बीच संतुलन स्थापित करके ही इस नीति को सही मायनों में धरातल पर उतारा जा सकता है।

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