देहरादून के हर्रावाला स्थित उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के प्रांगण में इन दिनों शिक्षा व्यवस्था की बदहाली की एक ऐसी दास्तान लिखी जा रही है जो हर संवेदनशील नागरिक को झकझोर देने के लिए काफी है। विभिन्न सत्रों के सैकड़ों छात्र-छात्राएं अपनी पढ़ाई की मुकम्मल नुमाइंदगी करने के बजाय विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर धरने पर बैठने को मजबूर हैं। उनकी आंखों में एक ही सवाल साफ झलकता है कि आखिर उनके सुनहरे भविष्य के साथ इस तरह का खिलवाड़ कब तक चलता रहेगा। विश्वविद्यालय के परिसरों में गूंजती इन आवाजों के पीछे वर्षों का दर्द और हताशा छिपी है जिसे प्रशासन ने लंबे समय से नजरअंदाज करने की भूल की है।

प्रदर्शनकारी छात्रों को हटाती पुलिस 

वर्षों से लंबित परिणाम शिक्षा व्यवस्था की बदहाली

​पूरे विवाद की जड़ में वह प्रशासनिक सुस्ती है जिसके कारण कई पाठ्यक्रमों, विशेषकर बीएएमएस के परीक्षा परिणाम चार साल तक लंबित पड़े हुए हैं। जरा सोचिए, उस युवा छात्र की मानसिक स्थिति क्या होगी? जिसने पूरी मेहनत से अपनी पढ़ाई पूरी की हो, लेकिन कागजों पर उसकी सफलता का कोई प्रमाण ही मौजूद न हो। जब परिणाम ही समय पर घोषित नहीं होते तो आगे की राह पूरी तरह धुंधली हो जाती है। छात्रों के लिए अनिवार्य मानी जाने वाली इंटर्नशिप की प्रक्रिया रुकी पड़ी है और उच्च शिक्षा या सरकारी नौकरियों के दरवाजे उनके लिए बंद से हो गए हैं। इस अनिश्चितता ने न सिर्फ छात्रों को बल्कि उनके अभिभावकों को भी गहरी मानसिक चिंता में डाल दिया है।

पानी की टंकी पर चढ़कर छात्रों ने किया उग्र प्रदर्शन

​हालात तब और ज्यादा तनावपूर्ण हो गए जब छात्रों का गुस्सा प्रबंधन की लगातार टालमटोल नीति के खिलाफ फूट पड़ा। बातचीत और लिखित पत्राचार के तमाम रास्ते जब बेअसर साबित हुए तो छात्रों ने सड़क पर उतरकर आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया। विरोध प्रदर्शन का सिलसिला तब और अधिक उग्र हो गया जब कुछ छात्र अपनी मांगों के समर्थन में विश्वविद्यालय परिसर की ऊंची पानी की टंकी पर जा बैठे। उस ऊंचे व जोखिम भरे कदम उठाने के पीछे छात्रों की वह लाचारी साफ झलक रही थी जो यह साबित करती है कि वे अपनी जायज मांगों को मनवाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। मौके पर पहुंची पुलिस और प्रशासनिक अमले की दौड़भाग इस बात की गवाही दे रही थी कि मामला अब सिर्फ एक संस्थान का नहीं बल्कि कानून व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही का बन चुका था।


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चिकित्सा शिक्षा पर खड़े होते गंभीर सवाल

​इस पूरे घटनाक्रम ने उत्तराखंड की चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। एक तरफ जहां सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ आयुर्वेद जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र के भावी चिकित्सकों को अपनी बुनियादी मार्कशीट और डिग्रियों के लिए सड़कों पर धक्के खाने पड़ रहे हैं। विश्वविद्यालय के जिम्मेदार अधिकारियों की तरफ से हमेशा की तरह स्टाफ की कमी या तकनीकी अड़चनों का बहाना बनाकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की जाती है, लेकिन छात्र अब किसी भी कोरे आश्वासन के चक्रव्यूह में फंसने को तैयार नहीं हैं। उनका साफ कहना है कि जब तक सभी रुके हुए परिणाम एक निश्चित समयावधि के भीतर जारी नहीं किए जाते, तब तक उनका यह आंदोलन किसी भी कीमत पर थमने वाला नहीं है।

आखिर कब खुलेगी ​प्रशासन की नींद

​यह संकट केवल कुछ परीक्षाओं के परिणामों की देरी का नहीं है, बल्कि यह एक पूरे तंत्र की संवेदनहीनता का जीवंत प्रमाण है। यदि समय रहते उच्च स्तर पर हस्तक्षेप कर इन प्रशासनिक अकर्मण्यताओं को दूर नहीं किया गया, तो यह विरोध और अधिक व्यापक रूप ले सकता है। विश्वविद्यालय के गलियारों में गूंजती यह नाराजगी इस बात का स्पष्ट संदेश है कि छात्रों के धैर्य की परीक्षा लेना प्रशासन के लिए भारी पड़ सकता है। अब देखना यह है कि कुंभकर्णी नींद में सोता प्रशासन इस सुलगती आग को बुझाने के लिए क्या ठोस कदम उठाता है या फिर युवाओं का भविष्य यूं ही नौकरशाही की फाइलों में उलझकर दम तोड़ता रहेगा।

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