अमेरिकी राजनीति और वैश्विक व्यापार के इतिहास में शुक्रवार का दिन बेहद नाटकीय रहा। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच चल रही खींचतान को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए ग्लोबल टैरिफ को अवैध घोषित कर दिया था। कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से स्पष्ट किया कि अमेरिकी संविधान के अनुसार कर या टैरिफ लगाने का अनन्य अधिकार केवल संसद यानी कांग्रेस के पास है, राष्ट्रपति के पास नहीं। हालांकि, इस फैसले की स्याही सूखने से पहले ही राष्ट्रपति ट्रंप ने व्हाइट हाउस में एक नए कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए। उन्होंने ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 122 का सहारा लेकर दुनिया भर के देशों पर 10% ग्लोबल टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी, जो आगामी 24 फरवरी से प्रभावी हो जाएगा।

न्यायपालिका पर ट्रंप का तीखा हमला

​सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने इस फैसले को निराशाजनक बताते हुए जजों की निष्ठा पर सवाल उठाए। ट्रंप ने कहा कि कुछ जज कट्टर वामपंथियों के हाथों की कठपुतली बन चुके हैं और उनमें देशहित में कड़े फैसले लेने का साहस नहीं है। उन्होंने उन तीन जजों की प्रशंसा की जिन्होंने उनके पक्ष में असहमति नोट लिखा था, जबकि बहुमत वाले जजों को राष्ट्र के लिए शर्म का विषय बताया। ट्रंप ने साफ कर दिया कि वह कानूनी लड़ाई से पीछे हटने वाले नहीं हैं और उनके अनुसार यह मामला अगले कई वर्षों तक अदालतों में खिंच सकता है।

भारत और अन्य सहयोगी देशों पर प्रभाव

​ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप के इस नए आदेश का असर उन देशों पर भी पड़ेगा जिनके साथ अमेरिका के व्यापारिक समझौते हैं। इसमें भारत, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। विशेष बात यह है कि भारत पर पहले कुछ मामलों में 18% तक टैरिफ लग रहा था, जो अब इस नए आदेश के बाद घटकर 10% रह जाएगा। ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपनी दोस्ती का हवाला देते हुए कहा कि भारत के साथ व्यापारिक संबंधों में कोई नकारात्मक बदलाव नहीं होगा। हालांकि, जमीनी स्तर पर व्हाइट हाउस के अधिकारी यह मान रहे हैं कि 10% की यह नई दर सार्वभौमिक रूप से लागू होगी।

सेक्शन 122 और आर्थिक आपातकाल की शक्ति

​राष्ट्रपति ट्रंप ने इस बार जिस कानूनी रास्ते को चुना है, वह 1974 के व्यापार अधिनियम का हिस्सा है। धारा 122 राष्ट्रपति को यह विशेष शक्ति देती है कि यदि अमेरिका को बड़े पैमाने पर व्यापार घाटे या आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा हो, तो वह अस्थायी रूप से 150 दिनों के लिए आयात पर प्रतिबंध या टैरिफ लगा सकते हैं। इस कानून का इतिहास 1971 के निक्सन प्रशासन से जुड़ा है, जब अमेरिका ने भुगतान संतुलन के संकट के समय इसी तरह का कदम उठाया था। ट्रंप का तर्क है कि वह इस शक्ति का उपयोग अमेरिका को आर्थिक रूप से सुरक्षित करने के लिए कर रहे हैं, जिसके लिए उन्हें संसद की अनुमति की आवश्यकता नहीं है।


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रिफंड और पुराने कानूनों का पेंच

​सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एक बड़ा सवाल उन 200 अरब डॉलर का था जो ट्रंप प्रशासन अब तक टैरिफ के रूप में वसूल चुका है। राष्ट्रपति ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी सरकार किसी भी कंपनी को यह पैसा वापस नहीं करेगी। उन्होंने तर्क दिया कि कोर्ट के आदेश में रिफंड की प्रक्रिया को लेकर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं। इसके अलावा, ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि स्टील और एल्युमिनियम पर लगे पुराने टैरिफ इस फैसले से प्रभावित नहीं होंगे क्योंकि वे अलग सुरक्षा कानूनों के तहत लगाए गए थे। कोर्ट ने मुख्य रूप से चीन पर लगे 34% और अन्य देशों पर लगे 25% के उन टैरिफ को निशाना बनाया था जो फेंटेनाइल तस्करी जैसे मुद्दों के आधार पर लगाए गए थे।

कानूनी चुनौतियां और व्यापारिक भविष्य

​कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप द्वारा धारा 122 का उपयोग करना एक नई कानूनी जंग को जन्म दे सकता है। न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, इस धारा का पहले कभी इस तरह व्यापक स्तर पर उपयोग नहीं हुआ है, इसलिए अदालतों में इसकी व्याख्या को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। ट्रंप ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह भी आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर विदेशी ताकतों का प्रभाव है, जो अमेरिका को कमजोर करना चाहती हैं। उनका मानना है कि यदि टैरिफ नहीं लगाए गए, तो विदेशी कंपनियां अमेरिकी उद्योगों को तबाह कर देंगी। अब पूरी दुनिया की नजरें 24 फरवरी पर टिकी हैं, जब यह नया आदेश धरातल पर उतरेगा और वैश्विक बाजारों की प्रतिक्रिया सामने आएगी।

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