बांग्लादेश के राजनैतिक क्षितिज पर 17 फरवरी 2026 की तारीख एक नए संघर्ष की इबारत लिखती नजर आ रही है। ढाका में सत्ता की बागडोर संभालते ही नवनियुक्त प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने उन संवैधानिक सुधारों को सिरे से खारिज कर दिया है जिनके लिए देश के युवाओं ने अपना लहू बहाया था। बीएनपी प्रमुख का यह कदम केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि उस व्यापक जनमत संग्रह को दी गई सीधी चुनौती है जिसमें आधे से अधिक नागरिकों ने व्यवस्था परिवर्तन के पक्ष में मतदान किया था। विशेषज्ञों का मानना है कि सत्ता की कुर्सी पर बैठते ही जनता के फैसलों को ठुकराना उस लोकतांत्रिक शुचिता का अपमान है जिसकी उम्मीद जुलाई 2024 के छात्र आंदोलन के बाद की गई थी। इस अड़ियल रुख ने उन आशंकाओं को जन्म दे दिया है कि क्या बांग्लादेश एक बार फिर उसी अंधेरे दौर की ओर लौट रहा है जहां सत्ता का केंद्रीकरण ही एकमात्र उद्देश्य होता है।

संवैधानिक पहरेदारी और निजी महात्वाकांक्षाओं का टकराव

​विवाद की जड़ वह 'जुलाई चार्टर' है जिसे डॉ. मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने भविष्य की तानाशाही को रोकने के लिए एक सुरक्षा कवच के रूप में तैयार किया था। इस चार्टर में निहित कार्यकाल की सीमा और दोहरे पदों पर रोक जैसे प्रावधान प्रधानमंत्री की शक्तियों को जवाबदेह बनाने के लिए थे। तारिक रहमान द्वारा इन प्रक्रियाओं को मानने से इनकार करना यह स्पष्ट करता है कि उनके लिए व्यक्तिगत और दलीय वर्चस्व राष्ट्रहित से ऊपर है। प्रधानमंत्री पद के साथ-साथ पार्टी अध्यक्ष बने रहने की जिद ने उन लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है जिन्हें मजबूत करने का वादा किया गया था। यह स्थिति केवल संवैधानिक गतिरोध नहीं बल्कि उस भरोसे की हत्या है जो आम आदमी ने नई व्यवस्था पर दिखाया था।

जमात का समर्थन और बढ़ता हुआ राजनैतिक ध्रुवीकरण

​इस पूरे घटनाक्रम में कट्टरपंथी दल जमात-ए-इस्लामी की भूमिका ने संकट को और अधिक गहरा दिया है। बीएनपी और जमात के बीच बना यह नया समीकरण संकेत दे रहा है कि बांग्लादेश में प्रगतिशील सुधारों के बजाय पारंपरिक और दलीय स्वार्थों की राजनीति प्रभावी हो रही है। सुधार परिषद से दूरी बनाने का जमात का फैसला इस बात की पुष्टि करता है कि सत्ता के नए गलियारों में जनता की आकांक्षाओं के लिए कोई स्थान नहीं है। विपक्षी दलों का यह गठबंधन भले ही आज संसद में संख्याबल के आधार पर मजबूत दिखे लेकिन सड़क पर उतरे उस नागरिक समाज की उपेक्षा करना उन्हें भारी पड़ सकता है जिसने हाल ही में एक शक्तिशाली शासन को उखाड़ फेंका था।

जुलाई क्रांति के आदर्शों पर मंडराता हुआ खतरा

​इतिहास गवाह है कि जब भी किसी शासक ने बहुमत के अहंकार में आकर जनभावनाओं को कुचला है उसका परिणाम जनविद्रोह के रूप में सामने आया है। अगस्त 2024 की क्रांति केवल सत्ता के चेहरों को बदलने के लिए नहीं थी बल्कि वह उस सड़ी-गली प्रणाली को बदलने की पुकार थी जिसने दशकों तक बांग्लादेश के विकास को बाधित किया। यदि नई सरकार द्विसदनीय संसद न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कार्यकाल की सीमा जैसे बुनियादी सुधारों को लागू करने में विफल रहती है तो इसे 'जुलाई क्रांति' के साथ एक ऐतिहासिक विश्वासघात माना जाएगा। ढाका की गलियों में सुलगता असंतोष और छात्र संगठनों की नाराजगी यह स्पष्ट कर रही है कि आने वाले समय में तारिक रहमान सरकार के लिए राह आसान नहीं रहने वाली है।


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