कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा और तत्पश्चात हुई पुलिस कार्रवाई से जुड़े मामले में उच्चतम न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने अठ्ठाइस जुलाई को दिए गए अपने पिछले आदेश में बड़ा संशोधन करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य सरकारें प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज सामान्य मामलों की एफआईआर वापस लेने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं। इस निर्णय के बाद आंदोलन के दौरान कानूनी पचड़े में फंसे आम कार्यकर्ताओं और प्रदर्शनकारियों को बड़ी राहत मिलने का रास्ता साफ हो गया है।

​शीर्ष अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए यह रेखांकित किया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रदर्शनों के दौरान दर्ज हुए हल्के और सामान्य प्रकृति के मुकदमों को निपटाने का अधिकार राज्यों के पास है। हालांकि, अदालत ने इस राहत की सीमाओं को बेहद स्पष्ट शब्दों में परिभाषित किया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि हत्या, दुष्कर्म और पॉक्सो जैसे अत्यंत गंभीर तथा जघन्य अपराधों के आरोपियों को किसी भी स्थिति में यह छूट नहीं दी जाएगी और उनके खिलाफ कानूनी प्रक्रिया पूर्ववत चलती रहेगी।

​इसके साथ ही उच्चतम न्यायालय ने प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए अपनाए जाने वाले पुलिसिया तरीकों और आधुनिक तकनीकों पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने प्रदर्शनकारियों पर पेलेट गन के इस्तेमाल, भीड़ की निगरानी के लिए फेशियल रिकग्निशन व सर्विलांस तकनीकों के प्रयोग तथा पुलिस कार्रवाई के स्थापित मानकों को लेकर सरकार से विस्तृत जवाब तलब किया है।

​कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से न केवल उन आम नागरिकों को राहत मिलेगी जो विरोध प्रदर्शनों के दौरान सामान्य धाराओं में उलझ गए थे, बल्कि यह फैसला भविष्य में पुलिस बल प्रयोग और राज्य द्वारा नागरिकों की निगरानी प्रणाली की जवाबदेही तय करने में भी दूरगामी भूमिका निभाएगा।


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