ढाका, (उत्तराखण्ड तहलका): अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण-बांग्लादेश (ICT-BD) ने पूर्व प्रधानमंत्री Sheikh Hasina और उनके पूर्व गृह मंत्री असदोज्जमां खान कमाल को 'मानवता के विरुद्ध विभिन्न अपराधों' के लिए मौत की सज़ा सुनाई है। यह ऐतिहासिक फैसला पिछले साल जुलाई-अगस्त 2024 में हुए छात्र-नेतृत्व वाले व्यापक सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा किए गए घातक दमन से जुड़े मुकदमे का परिणाम है।

न्यायाधिकरण ने बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, 1971 के मुक्ति संग्राम के बाद देश की सबसे भीषण अशांति में 1400 से अधिक लोगों की हत्या का दोषी Sheikh Hasina और कमाल को ठहराया है। अदालत ने इस कार्रवाई को "योजनाबद्ध और व्यवस्थित" करार दिया, जिसका उद्देश्य निहत्थे नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध को बलपूर्वक कुचलना था।
Sheikh Hasina पर लगाए गए प्रमुख आरोप
ICT-BD, जिसकी स्थापना मूल रूप से 1971 के युद्ध अपराधों के लिए की गई थी, ने इस मामले में कठोर रुख अपनाया। Sheikh Hasina पर मुख्य रूप से तीन गंभीर आरोप सिद्ध हुए, जिन्होंने अदालत की नजर में उन्हें 'मास्टरमाइंड' और 'प्रमुख वास्तुकार' बना दिया:
- हत्या का आदेश: अदालत ने पाया कि Sheikh Hasina ने सीधे तौर पर सुरक्षा बलों को "कड़े और घातक बल" का उपयोग करने का आदेश दिया था। साक्ष्य में हेलिकॉप्टरों, ड्रोन और घातक हथियारों के उपयोग के आदेशों की पुष्टि हुई, जिससे निहत्थे नागरिकों, विशेषकर छात्रों की मौत हुई।
- हिंसा भड़काना: अभियोजन पक्ष ने Sheikh Hasina के नफरत भरे और अपमानजनक भाषणों को पेश किया, जिन्होंने राजनीतिक प्रतिशोध और हिंसा को बढ़ावा दिया।
- न्याय रोकने में विफलता: उन पर हत्याओं को रोकने में जानबूझकर विफल रहने और अपने सुरक्षा बलों व पार्टी के सदस्यों द्वारा किए गए अपराधों के लिए कोई कार्रवाई न करने का भी आरोप लगा।
इसी मामले में, पूर्व पुलिस महानिरीक्षक चौधरी अब्दुल्ला अल-मामून को भी दोषी ठहराया गया, हालांकि सरकारी गवाह बनने के कारण उन्हें कम सज़ा दी गई। न्यायाधिकरण ने Sheikh Hasina और कमाल की संपत्ति जब्त करने का आदेश भी दिया है।
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फैसला सुनाए जाने के समय Sheikh Hasina की स्थिति
फैसला सुनाए जाने के समय पूर्व प्रधानमंत्री Sheikh Hasina भारत में निर्वासन में हैं, जहां उन्होंने अगस्त 2024 में अपनी सरकार गिरने के बाद शरण ली थी। उनकी अनुपस्थिति में उन पर मुकदमा चलाया गया, जिसे 'इन एब्सेन्टिया (in absentia)' ट्रायल कहा जाता है।
Sheikh Hasina की पार्टी, अवामी लीग, ने इस फैसले को तुरंत खारिज कर दिया। पार्टी के प्रवक्ता ने इसे 'राजनीतिक प्रतिशोध' और 'कंगारू कोर्ट' का निर्णय बताते हुए दावा किया कि अंतरिम सरकार अपनी शक्ति का दुरुपयोग करके अवामी लीग के नेतृत्व को समाप्त करना चाहती है। Sheikh Hasina के कानूनी सलाहकार ने संकेत दिया है कि वह अपने वकीलों के माध्यम से, ICT एक्ट 1973 की धारा 21 के तहत, बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट की अपीलीय डिवीजन में अपील दायर करेंगी।
भारत के लिए जटिल कूटनीतिक और कानूनी स्थिति
यह संवेदनशील फैसला नई दिल्ली के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती लेकर आया है। चूँकि पूर्व प्रधानमंत्री Sheikh Hasina भारत में शरण लिए हुए हैं, बांग्लादेश की अंतरिम सरकार जल्द ही उनके प्रत्यर्पण की औपचारिक मांग कर सकती है और इंटरपोल के माध्यम से रेड-कॉर्नर नोटिस जारी करने का अनुरोध भी कर सकती है।
भारत को अब अपने प्रत्यर्पण संधियों और अंतरराष्ट्रीय कानूनों की कसौटी पर इस मांग का मूल्यांकन करना होगा। Sheikh Hasina के मामले में भारत का अगला कदम इस क्षेत्र की भू-राजनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होगा। भारत को एक तरफ पड़ोसी देश के साथ संबंधों को बनाए रखना है, वहीं दूसरी ओर एक पूर्व राष्ट्र प्रमुख को शरण देने के संवेदनशील राजनीतिक परिणामों को भी ध्यान में रखना होगा।
बांग्लादेश में बढ़ी सुरक्षा और राजनीतिक अनिश्चितता
इस फैसले के बाद बांग्लादेश में सुरक्षा बढ़ा दी गई है। अवामी लीग के समर्थकों ने देशव्यापी बंद का आह्वान किया है, जिसके चलते ढाका और अन्य शहरों में हिंसक विरोध प्रदर्शन, आगजनी और कॉकटेल विस्फोट की खबरें हैं। अंतरिम सरकार ने किसी भी बड़े विद्रोह को रोकने के लिए सेना, रैपिड एक्शन बटालियन और सीमा सुरक्षा बलों को तैनात किया है, ताकि देश में कानून व्यवस्था बनी रहे। यह फैसला बांग्लादेश की राजनीति में एक नए और अत्यंत अस्थिर चरण की शुरुआत करता है।
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