जबलपुर से जारी अपने कड़े संदेश में द्वारका शारदा पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती महाराज ने प्रयागराज के माघ मेले में चल रहे विवाद पर गहरा रोष व्यक्त किया है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि शंकराचार्य की पदवी कोई प्रशासनिक नियुक्ति नहीं है, बल्कि यह शास्त्रोक्त उत्तराधिकार की एक पवित्र परंपरा है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पक्ष में मजबूती से खड़े होते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि वे उनके गुरु भाई हैं और शृंगेरी पीठ के शंकराचार्य द्वारा विधि-विधान से किए गए अभिषेक के बाद उनकी वैधता पर सवाल उठाना न केवल अज्ञानता है, बल्कि सनातन धर्म की मान्यताओं का अपमान भी है।

सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर तीखे प्रहार

स्वामी सदानंद सरस्वती ने प्रशासन की भूमिका को आड़े हाथों लेते हुए आरोप लगाया कि सरकारी तंत्र जानबूझकर असली शंकराचार्यों के प्रभाव और महत्व को कम करने का षड्यंत्र रच रहा है। उन्होंने इस बात पर आश्चर्य और नाराजगी जताई कि शासन द्वारा फर्जी संतों को संरक्षण और प्रोत्साहन दिया जा रहा है, जो कि हिंदू धर्म की जड़ों को खोखला करने जैसा है। उनके अनुसार, किसी भी सरकारी अधिकारी या तंत्र के पास यह संवैधानिक या धार्मिक अधिकार नहीं है कि वह किसी स्थापित शंकराचार्य से उनकी प्रामाणिकता का प्रमाण मांगे। इस तरह की हठधर्मिता धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का खुला उल्लंघन है।

बटुकों पर बर्बरता और राजनीति का घातक प्रवेश

प्रयागराज में ब्राह्मण छात्र बटुकों के साथ हुई कथित मारपीट की घटना पर दुःख व्यक्त करते हुए महाराज ने इसे निंदनीय करार दिया। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि निहत्थे और निर्दोष बच्चों को पीटना किसी भी सभ्य समाज के लिए कलंक है। उन्होंने सत्ता के गलियारों को आगाह किया कि इतिहास गवाह है कि ब्राह्मणों और संतों पर अत्याचार करने वाला कभी सुखी नहीं रहा है। इस धार्मिक आयोजन में राजनीति के प्रवेश को उन्होंने दुर्भाग्यपूर्ण बताया और जोर देकर कहा कि देश के अन्य तीनों पीठों के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ चट्टान की तरह खड़े हैं।

समाधान की राह और क्षमा याचना का सुझाव

विवाद को शांत करने का एकमात्र मार्ग बताते हुए स्वामी सदानंद सरस्वती ने सुझाव दिया कि यदि प्रशासन अपनी भूल स्वीकार कर ले और संतों से क्षमा मांग ले, तो यह गतिरोध तत्काल समाप्त हो सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सनातन परंपरा में क्षमा का स्थान सर्वोपरि है, लेकिन आत्मसम्मान और धर्म की मर्यादा से समझौता कतई स्वीकार्य नहीं होगा। यह पूरा प्रकरण अब केवल एक व्यक्ति का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरी सनातन परंपरा की अस्मिता और स्वाभिमान की लड़ाई बन चुका है जिसे अंजाम तक ले जाया जाएगा।


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