आशियाने पर दबंग का कब्जा और खाकी की बेरुखी जब बर्दाश्त से बाहर हुई, तो बेबस राजबाला इंसाफ के लिए पेट्रोल लेकर SSP दफ्तर पहुंच गई। सिस्टम की अनदेखी ने एक पीड़ित को अपनी ही जान दांव पर लगाने के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया।
यहाँ सवाल यह उठता है कि क्या न्याय की प्रणाली अब आम आदमी का गला घोंटने वाला फंदा बन चुकी है? क्या पुलिस का रसूख अब सिर्फ गरीब की बेबसी का तमाशा देखने और सड़कों पर 'चालान वसूली' का टारगेट पूरा करने तक सीमित रह गया है? ऊधम सिंह नगर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक दफ्तर में शनिवार को जो खौफनाक मंजर देखने को मिला, उसने शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं जिनका जवाब देना अब हुक्मरानों के लिए मुश्किल होगा। यह मामला महज एक महिला के आत्मदाह के प्रयास का नहीं, बल्कि उस आम जनमानस की घुटन का है जो सिस्टम की देरी, अहंकार और उदासीनता की भेंट चढ़ रही है।
आशियाने पर कब्जा और सिस्टम की बेरुखी
मामला आवास विकास निवासी राजबाला का है। इस कमरतोड़ महंगाई के दौर में एक आम आदमी पाई-पाई जोड़कर, अपनी खुशियों की कुर्बानी देकर बामुश्किल एक आशियाना नसीब कर पाता है। लेकिन राजबाला के लिए उसका अपना घर ही दुख का सबब बन गया। आरोप है कि एक रसूखदार दबंग ने उनके मकान पर जबरन कब्जा जमा लिया है। जब राजबाला इस अन्याय के खिलाफ न्याय की आस लेकर ट्रांजिट कैंप थाने पहुंचीं, तो उन्हें वहां वह सुरक्षा नहीं मिली जिसकी अपेक्षा एक पीड़ित को होती है। पिछले कई दिनों से उन्हें थाने के चक्कर कटवाए गए। पुलिस की कार्यशैली से ऐसा प्रतीत हुआ मानो उनके लिए पीड़ित की सिसकियां नहीं, बल्कि मामले को टाल देना ज्यादा जरूरी था।
जीरो टॉलरेंस या रस्म-अदायगी?
प्रदेश सरकार लगातार 'जीरो टॉलरेंस' और 'कानून का राज' होने का दावा करती है। लेकिन यदि आज भी अपराधी और दबंग अपनी मनमानी करने में सफल हो पा रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर सरकार की इस नीति की विफलता को दर्शाता है। अक्सर देखा जाता है कि पुलिस सड़कों पर नियमों का हवाला देकर देर शाम तक चालान काटने में जितनी सक्रियता और ऊर्जा दिखाती है, वैसी मुस्तैदी किसी मजबूर की शिकायत दर्ज करने में क्यों गायब हो जाती है? क्या पुलिस का काम सिर्फ जुर्माना वसूलना रह गया है? यदि पीड़ितों को 'कल आना' कहकर टरकाने के बजाय पुलिस ने समय पर संज्ञान लिया होता, तो शायद राजबाला को पेट्रोल लेकर एसएसपी दफ्तर नहीं आना पड़ता।
उच्चाधिकारियों का सहारा, वर्ना व्यवस्था हो जाए 'अंधी'
इस पूरे घटनाक्रम ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि निचले स्तर पर संवेदनशीलता किस कदर खत्म हो चुकी है। सच्चाई तो यह है कि यदि विभाग में कुछ संवेदनशील और न्याय प्रिय उच्चाधिकारी न हों, तो यह पूरी व्यवस्था और भी अधिक निरंकुश और अंधी हो जाए। राजबाला को न्याय की उम्मीद भी तब जगी जब मामला उच्चाधिकारियों के संज्ञान में आया। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर पीड़ित को अपनी बात अधिकारियों तक पहुँचाने के लिए पेट्रोल की बोतल का सहारा लेना पड़ेगा? थाना स्तर पर तैनात जिम्मेदार आखिर किसके आदेश का इंतज़ार करते हैं?
रोते हुए सुनाई व्यथा, जागा प्रशासन
शनिवार को जैसे ही राजबाला हाथ में पेट्रोल की शीशी लिए एसएसपी कार्यालय पहुंची, वहां हड़कंप मच गया। आनन-फान में पुलिस ने उन्हें घेरे में लिया और अपर पुलिस अधीक्षक (एसपी सिटी) उत्तम सिंह नेगी के समक्ष पेश किया। वहां राजबाला का सब्र का बांध टूट गया और वह फूट-फूटकर अपनी व्यथा सुनाने लगीं। एसपी सिटी ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए तत्काल संबंधित थाने को सख्त कार्यवाही के निर्देश दिए।
"महिला अपनी शिकायत लेकर आई थी, जिसकी बात को ध्यानपूर्वक सुना गया है। संबंधित थाना पुलिस को मामले में तुरंत और प्रभावी कानूनी कार्यवाही करने के आदेश दे दिए गए हैं।"
— उत्तम सिंह नेगी, एसपी सिटी
वक्त है जागने का...
आज जनता पहले से ही टैक्स की मार और महंगाई से त्रस्त है। ऐसे में जब न्याय की प्रणाली भी उसका गला घोंटने लगे, तो स्थिति भयावह हो जाती है। राजबाला की चीख उन तमाम लोगों की आवाज है जो फाइलों के बोझ तले दबे हुए हैं। यदि अब भी प्रशासन की नींद नहीं खुली और थाना स्तर पर जवाबदेही तय नहीं की गई, तो जनता का रहा-बचा यह भरोसा भी एक दिन टूट जाएगा। वक्त है कि कागजों से बाहर निकलकर धरातल पर इंसाफ किया जाए, वरना 'जीरो टॉलरेंस' सिर्फ एक किताबी जुमला बनकर रह जाएगा।
---समाप्त---