भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका अंदाजा जनपद की एक राइस मिल में सामने आए बड़े घोटाले से लगाया जा सकता है। सरकारी तंत्र को ठेंगा दिखाते हुए ने धान की कुटाई के नाम पर न केवल नियमों की धज्जियां उड़ाईं, बल्कि लाखों रुपये के सरकारी चावल को भी खुर्द-बुर्द कर दिया। यह मामला सीधे तौर पर पीसीयू के साथ की गई एक बड़ी धोखाधड़ी है, जिसमें सरकारी संपत्ति को निजी स्वार्थ के लिए बाजार में खपा दिया गया। इस पूरे प्रकरण ने विभागीय निगरानी और मिलों को धान आवंटन करने की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
रिकवरी के नाम पर ठेंगा और अधिकारियों की आंखों में धूल
खरीफ सत्र 2023-24 के तहत मूल्य समर्थन योजना के जरिए स्वास्तिक राइस लैंड प्राइवेट लिमिटेड को 4462 क्विंटल धान आवंटित किया गया था। सरकारी नीति के कड़े प्रावधानों के तहत मिल को 67 प्रतिशत रिकवरी के साथ कुल 2989.54 क्विंटल चावल राजकीय गोदामों में वापस जमा करना था। इसके लिए भारत सरकार ने 15 सितंबर 2024 की अंतिम समय सीमा निर्धारित की थी। लेकिन मिल प्रबंधन की मंशा कुछ और ही थी। निर्धारित तिथि बीत जाने के महीनों बाद तक मिल ने मात्र 178.20 क्विंटल चावल ही जमा किया। शेष 2811.34 क्विंटल चावल का कोई हिसाब-किताब विभाग को नहीं दिया गया। यह महज एक लापरवाही नहीं, बल्कि सोची-समझी साजिश का हिस्सा प्रतीत होता है, जहां सरकारी अनाज को खुर्द-बुर्द कर सरकारी खजाने को लगभग 98.47 लाख रुपये की चपत लगाई गई।
भौतिक सत्यापन में खुला राज और खाली मिली राइस मिल
जब सरकारी चावल की वापसी में लगातार देरी हुई और मिल प्रबंधन के बहाने बढ़ने लगे, तब जिलाधिकारी के निर्देश पर एक उच्च स्तरीय जांच टीम का गठन किया गया। 18 अक्टूबर 2024 को नायब तहसीलदार सुरेश चंद्र बुढलाकोटी के नेतृत्व में जब टीम ने बिन्दुखेड़ा स्थित मिल परिसर का भौतिक सत्यापन किया, तो वहां का नजारा देख अधिकारी भी दंग रह गए। मिल परिसर में धान का एक भी दाना मौजूद नहीं था। पूरी मिल खाली पड़ी थी और वहां केवल 23 कट्टे टूटा चावल व 320 कट्टे एफआरके ही मिले। जो मिल हजारों क्विंटल धान से भरी होनी चाहिए थी, वहां केवल खाली बोरे पड़े थे। इस स्थिति ने साफ कर दिया कि मिल संचालकों ने सरकारी धान को अवैध रूप से बाजार में बेचकर मोटा मुनाफा कमा लिया है और अब विभाग को गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं।
शपथ पत्र का ड्रामा और कानूनी कार्रवाई की हकीकत
जांच के दौरान पकड़े जाने पर मिल प्रबंधन ने कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए हथकंडे अपनाना शुरू कर दिया। मिल के निदेशक ने एक शपथ पत्र प्रस्तुत कर छह महीने के भीतर भुगतान करने का समय मांगा और नई फर्म बनाकर बैंक ऋण के माध्यम से बकाया चुकाने का आश्वासन दिया। लेकिन समय बीतने के साथ यह साफ हो गया कि ये तमाम वादे केवल समय काटने की एक रणनीति थे। हद तो तब हो गई जब मिल प्रबंधन ने अपनी बातों से मुकरते हुए विभाग द्वारा जमा किए गए सिक्योरिटी चेकों को बैंक में न लगाने का कानूनी नोटिस भेज दिया। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण था कि मिल के खातों में पर्याप्त धनराशि नहीं थी और वे केवल प्रशासन को उलझाए रखना चाहते थे। अंततः पीसीयू के क्षेत्रीय प्रबंधक धीरज कुमार की तहरीर पर पुलिस ने निदेशक पुरुषोत्तम दास, लक्ष्मी अग्रवाल और लेखाकार राजेंद्र सिंह के खिलाफ षडयंत्र और गबन की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है।
भ्रष्टाचार के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस पर उठते सवाल
रुद्रपुर का यह मामला केवल एक राइस मिल की धोखाधड़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन तमाम राइस मिलों के लिए एक चेतावनी है जो सरकारी अनाज को अपनी जागीर समझते हैं। विभाग ने 10 जुलाई 2025 तक भुगतान का अंतिम मौका दिया था, लेकिन मिल प्रबंधन की हठधर्मिता ने पुलिस को हस्तक्षेप करने पर मजबूर कर दिया। अब पुलिस मिल के वित्तीय लेन-देन और संचालकों की अन्य संपत्तियों की गहराई से जांच कर रही है। बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकारी तंत्र इन रसूखदार मिल संचालकों से जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा वापस वसूल पाएगा या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा। इस घोटाले ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भ्रष्टाचार की दीमक सरकारी योजनाओं को भीतर ही भीतर खोखला कर रही है और प्रशासनिक अमले को अधिक सतर्क होने की आवश्यकता है।
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