पंजाब की आबोहवा में जब भी कोई हलचल होती है, तो उसका असर केवल राज्य तक सीमित नहीं रहता। बीते कुछ दिनों में लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी और चितकारा यूनिवर्सिटी जैसे नामी निजी शिक्षण संस्थानों में जिस तरह आधी रात को छात्रों का गुस्सा सड़कों पर उतरा, उसने हर किसी को चौंका दिया है। गाड़ियों में तोड़फोड़, राष्ट्रीय राजमार्ग पर घंटों का चक्काजाम और पुलिस की भारी तैनाती ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर लाखों की फीस भरने वाले नौजवानों में ऐसा कौन सा खौफ या गुस्सा भर गया था जो इस कदर फूट पड़ा। राज्य में अगले विधानसभा चुनावों की सुगबुगाहट शुरू होते ही शिक्षण परिसरों का इस तरह सुलगना महज एक संयोग नहीं हो सकता। यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह शिक्षा के नाम पर चल रही दुकानों में बरसों से घुट रहे छात्रों की स्वाभाविक चीख है, या फिर चुनावी मौसम में किसी बड़ी सियासी बिसात की पहली चाल?

​इस पूरे हंगामे की पहली और सबसे कड़वी सच्चाई इन निजी विश्वविद्यालयों की चारदीवारी के भीतर छिपी है। आज के दौर में निजी संस्थान खुद को ज्ञान के मंदिर से ज्यादा एक बड़े कॉर्पोरेट ब्रांड के तौर पर पेश करते हैं। ऐसे में जब भी कैंपस के भीतर कोई अप्रिय घटना घटती है—चाहे वह किसी छात्र का मानसिक तनाव में आकर जान देना हो, हॉस्टल में किसी लड़की के साथ छेड़छाड़ की शिकायत हो या सुरक्षा में बड़ी सेंध—प्रबंधन का पहला काम समस्या सुलझाना नहीं, बल्कि अपनी चमकती हुई छवि को बचाना होता है। सच को दबाने और छात्रों को चुप कराने की यह कोशिश अंदर ही अंदर भारी घुटन पैदा करती है। जब हॉस्टल के कमरे में कोई अनहोनी होती है और प्रशासन समय पर सामने आकर सच नहीं बताता, तो सोशल मीडिया के इस दौर में अफवाहों को पंख लग जाते हैं। कड़े और बेतुके पाबंदियों से परेशान छात्र-छात्राओं को जब यह लगने लगता है कि बिना सड़क पर उतरे कोई उनकी सुनने वाला नहीं है, तो वही अविश्वास हिंसक विरोध बनकर बाहर आ जाता है।

​हंगामे के बाद सियासी गलियारों में यह थ्योरी तेजी से चलाई गई कि ये संस्थान किसी खास राजनीतिक दल के प्रभाव में हैं और जानबूझकर मौजूदा आम आदमी पार्टी की सरकार को बैकफुट पर धकेलने के लिए यह सब रचा गया। लेकिन जमीन पर खड़े होकर देखें तो मामला इतना सीधा नहीं दिखता। एलपीयू के कर्ताधर्ता आम आदमी पार्टी के जरिए ही संसद के ऊपरी सदन तक पहुंचे हैं, भले ही हाल के दिनों में उनकी सियासी नजदीकियों को लेकर नई चर्चाएं हवा में तैर रही हों। वहीं चितकारा यूनिवर्सिटी मुख्य रूप से शिक्षाविदों द्वारा खड़ा किया गया ढांचा है, जिसका किसी एक दल से खुला राजनीतिक नाता नहीं रहा है। ऐसे में पूरे मामले को सीधे तौर पर किसी एक पार्टी की साजिश करार दे देना उन हजारों आम छात्र-छात्राओं की जायज चिंताओं पर पर्दा डालने जैसा होगा, जो बुनियादी सुरक्षा और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए परेशान हैं।

​फिर भी इस हकीकत से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि चुनावी मुहाने पर खड़े पंजाब में कोई भी आग बिना सियासी घी के इतनी नहीं भड़कती। राज्य में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सभी पार्टियां अपनी गोटियां बिछाने में जुट चुकी हैं। मुख्य विपक्षी दलों के लिए यह एक सुनहरा मौका बन गया कि वे भगवंत मान सरकार को कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर घेर सकें। जब हाईवे पर गाड़ियां जलती हैं और पुलिस मूकदर्शक नजर आती है, तो विरोधी खेमे को यह नैरेटिव बनाने में आसानी हो जाती है कि सूबे में सरकार का नियंत्रण खत्म हो चुका है। छात्र संगठनों की आड़ में राजनीतिक दलों के कैडर का कैंपस में घुसना और छात्रों के जायज गुस्से को राजनीतिक आंदोलन में बदल देना कोई नई बात नहीं है। पश्चिमी देशों और दुनिया के बड़े विश्वविद्यालयों में जब ऐसी घटनाएं होती हैं, तो वहां एक पारदर्शी जांच समिति तुरंत मीडिया और छात्रों के सामने आंकड़े रखती है, जिससे अफवाहों का बाजार गर्म नहीं हो पाता। हमारे यहां ठीक इसका उलटा होता है; पहले बात छुपाई जाती है और फिर राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए मैदान खुला छोड़ दिया जाता है।


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​इस पूरे घटनाक्रम ने आम लोगों और अपने बच्चों को दूर-दराज पढ़ने भेजने वाले परिजनों की नींद उड़ा दी है। घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर रहकर डिग्री लेने आए छात्र अगर खुद को हॉस्टल की चहारदीवारी में असुरक्षित पाएंगे, तो यह पूरे उच्च शिक्षा तंत्र पर एक गहरा दाग है। सरकार को चाहिए कि वह केवल साजिश का ठीकरा विपक्ष पर फोड़कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला न झाड़े। निजी विश्वविद्यालयों की जवाबदेही तय करने के लिए सख्त गाइडलाइंस जमीन पर लागू करनी होंगी, जहां छात्र कल्याण परिषद केवल कागजों पर न चले। वहीं शिक्षण संस्थानों के मालिकों को भी समझना होगा कि छात्रों की हिफाजत और उनका भरोसा किसी भी चमकदार विज्ञापनों से कहीं ज्यादा कीमती है। अगर वक्त रहते संवाद की खिड़कियां नहीं खोली गईं, तो आने वाले दिनों में यह आग सिर्फ एक-दो परिसरों तक सीमित नहीं रहेगी।

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