पुणे के गंजेवे चौक और एस. एम. जोशी मार्ग पर रात-दिन का फर्क मिट चुका है। खुले आसमान के नीचे दरी बिछाकर बैठे हजारों छात्र पिछले पांच दिनों से लगातार डटे हुए हैं। यह भीड़ किसी राजनीतिक दल की बुलाई हुई रैली नहीं, बल्कि उन युवाओं का जमावड़ा है जो महाराष्ट्र के विदर्भ, मराठवाड़ा और सूखा प्रभावित ग्रामीण इलाकों से आकर यहां दिन-रात पढ़ाई कर रहे थे। एक-एक कमरे में चार-चार साथी रहकर, टिफिन का सादा खाना खाकर और घर से आने वाले सीमित पैसों में अपनी जरूरतों को काटकर ये छात्र बरसों से एमपीएससी की तैयारी कर रहे थे। अब जब परीक्षाओं में गड़बड़ी और पेपर लीक जैसी खबरें सामने आ रही हैं, तो इन छात्रों का सब्र टूट चुका है। उनका कहना है कि यह केवल एक परीक्षा का मामला नहीं, बल्कि ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले उन परिवारों के सपनों पर कुठाराघात है जिन्होंने अपनी जमीन तक गिरवी रखकर बच्चों को पढ़ने के लिए पुणे भेजा था।
आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल
धरने पर बैठे छात्रों का गुस्सा सीधे तौर पर महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग के प्रशासनिक रवैये के खिलाफ है। परीक्षार्थियों का आरोप है कि हाल के दिनों में आयोजित परीक्षाओं, खासकर ड्रग इंस्पेक्टर भर्ती और अन्य तकनीकी संवर्ग की परीक्षाओं में भारी अनियमितताएं हुई हैं। छात्रों का कहना है कि जब प्रश्नपत्र पहले ही बाहर आ जाते हैं या चहेतों को लाभ पहुंचाने के लिए नियम बदले जाते हैं, तो साल-दर-साल लाइब्रेरी में पसीना बहाने वाले सामान्य अभ्यर्थियों की सारी मेहनत बेकार चली जाती है। आंदोलनकारियों की सबसे पहली और अडिग मांग यही है कि आयोग के वर्तमान अध्यक्ष विवेक भिमनवार अपने पद से तुरंत इस्तीफा दें। छात्रों का तर्क है कि जब तक शीर्ष स्तर पर जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक निष्पक्ष जांच संभव ही नहीं है। प्रदर्शन स्थल पर मौजूद युवाओं ने दो टूक शब्दों में कहा है कि यदि सरकार ने उनकी पांच सूत्री मांगों पर ठोस कदम नहीं उठाए, तो वे आमरण अनशन और क्रमिक भूख हड़ताल शुरू करने से भी पीछे नहीं हटेंगे।
प्रशासनिक सख्ती के बीच बढ़ा आक्रोश
आंदोलन के पांचवें दिन छात्रों के हौसले में कोई कमी नहीं दिखी, हालांकि प्रशासनिक स्तर पर आंदोलन को खत्म कराने के कई प्रयास किए गए। छात्रों का आरोप है कि पुलिस और स्थानीय प्रशासन द्वारा शांतिपूर्ण धरने को दबाने की कोशिशें की जा रही हैं। कई सक्रिय छात्रों को नोटिस थमाए गए हैं और आंदोलन स्थल के आसपास पाबंदियां लगाने की तैयारी की जा रही थी। इसके बावजूद छात्र पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि वे संविधान के दायरे में रहकर अपनी आवाज उठा रहे हैं। रात की ठंड और दिन की कड़ी धूप के बीच भी छात्र सड़कों पर बैठकर अपनी किताबें साथ रखे हुए हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जब तक भर्ती प्रक्रियाओं को फूलप्रूफ नहीं बनाया जाता, परीक्षा केंद्रों पर कड़े नियम लागू नहीं होते और प्रश्नपत्र लीक कराने वाले गिरोहों के मास्टरमाइंड जेल के पीछे नहीं जाते, तब तक वे अपना बोरिया-बिस्तर समेटने वाले नहीं हैं।
धरने में गूंजे राहुल-राहुल के नारे
इसी बीच आंदोलन स्थल पर उस वक्त माहौल पूरी तरह बदल गया, जब अपनी मांगों को लेकर डटे अभ्यर्थियों की भीड़ से अचानक 'राहुल, राहुल' के नारे गूंजने लगे। परीक्षाओं में कथित धांधली और पेपर लीक के विरोध में बैठे इन युवाओं ने राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष से मिले समर्थन के बाद अपनी आवाज और बुलंद कर दी।
पुणे धरने में छात्रों द्वारा लगाए गए 'राहुल, राहुल' के नारों का वायरल वीडियो
हालांकि, नारेबाजी के बीच छात्रों ने साफ किया कि वे किसी दल के कार्यकर्ता नहीं हैं, बल्कि उनका मकसद सिर्फ आयोग के अध्यक्ष के इस्तीफे, निष्पक्ष जांच और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया जैसी अपनी पांच सूत्री जायज मांगों को पूरा कराना है। छात्रों का कहना है कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष द्वारा उनके संघर्ष को आवाज दिए जाने से उन्हें उम्मीद बंधी है कि अब सरकार पर दबाव बनेगा।
सड़क पर पहुंचे जनप्रतिनिधि, सरकार को चेतावनी
छात्रों के बढ़ते आक्रोश के बीच एनसीपी (शरदचंद्र पवार गुट) के विधायक रोहित पवार खुद प्रदर्शनकारियों के बीच जमीन पर बैठकर धरने में शामिल हुए। उन्होंने छात्रों के साथ लंबी बातचीत की और उनकी चिंताओं को समझा। इसके बाद मीडिया से बात करते हुए उन्होंने शासन के रुख की कड़ी आलोचना की। पवार ने सीधे तौर पर कहा कि प्रशासन छात्रों पर नोटिस भेजकर या कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर उनकी आवाज नहीं दबा सकता। अगर किसी भी छात्र के खिलाफ दमनात्मक कदम उठाया गया, तो पूरा विपक्ष सड़क पर उतरकर आंदोलन को व्यापक रूप देगा। उन्होंने कहा कि सरकार को अपनी हठधर्मिता छोड़कर छात्रों के 15 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल को तत्काल वार्ता के लिए बुलाना चाहिए। पवार ने यह भी कहा कि यदि सरकार इन युवाओं की जायज मांगें मान लेती है और निष्पक्ष जांच का लिखित भरोसा देती है, तो छात्र खुद आगे बढ़कर प्रशासन का सहयोग करेंगे, लेकिन अनदेखी की स्थिति में यह आंदोलन अब सिर्फ पुणे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे राज्य में फैलेगा।
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