चंडीगढ़: गुरुपर्व पर पंजाब में PU Governance Row खत्म हो गया। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने पंजाब यूनिवर्सिटी (Panjab University - PU) के शासी निकायों, सीनेट और सिंडिकेट के पुनर्गठन और भंग करने से संबंधित अपनी विवादास्पद अधिसूचना को वापस ले लिया है।

यह फैसला पंजाब में विभिन्न राजनीतिक दलों, छात्र संगठनों, शिक्षाविदों और पंजाबसरकार के कड़े और संगठित विरोध के बाद लिया गया है। इस वापसी को विश्वविद्यालय के लोकतांत्रिक ढांचे की रक्षा में एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है।

पिछले एक सप्ताह से पंजाब यूनिवर्सिटी परिसर और पूरे राज्य में PU Governance Row को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही थीं, जिसने केंद्र को अपना रुख बदलने पर मजबूर कर दिया।


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​विवादास्पद नोटिफिकेशन: यूनिवर्सिटी की स्वायत्तता पर सवाल

​केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग द्वारा 28 अक्टूबर 2025 को जारी मूल अधिसूचना ने न केवल अकादमिक जगत को चौंकाया, बल्कि इसने एक गंभीर PU Governance Row को जन्म दे दिया। इस अधिसूचना में 59 साल पुराने सीनेट और सिंडिकेट में निम्नलिखित व्यापक बदलाव प्रस्तावित थे:

  1. सदस्यों की संख्या में कटौती: सीनेट के सदस्यों की संख्या को 90 से घटाकर मात्र 31 करने का प्रस्ताव था। इस भारी कटौती ने कई स्टेकहोल्डर्स को प्रतिनिधित्व से बाहर कर दिया होता।
  2. लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व खत्म: सबसे विवादास्पद कदम स्नातक मतदाताओं (graduate voters) के निर्वाचन की प्रक्रिया को पूरी तरह से समाप्त करना था। यह प्रणाली यूनिवर्सिटी को समाज के एक बड़े वर्ग से जोड़ती थी।
  3. मनोनीत सदस्यों का वर्चस्व: प्रस्तावित बदलावों से विश्वविद्यालय की शासी संरचना (governance structure) में निर्वाचित सदस्यों के मुकाबले मनोनीत (nominated) सदस्यों की संख्या में भारी वृद्धि हो जाती, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर होती और सरकारी हस्तक्षेप बढ़ने की आशंका पैदा होती।

​शिक्षाविदों और पंजाब के नेताओं ने इस कदम को विश्वविद्यालय की शैक्षणिक स्वायत्तता (academic autonomy) और पंजाब की गौरवशाली विरासत पर सीधा हमला बताया, जिसने PU Governance Row को राजनीतिक रंग दे दिया।

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​राजनीतिक लामबंदी और छात्र आंदोलन की शक्ति

​नोटिफिकेशन जारी होते ही, पंजाब यूनिवर्सिटी के छात्रों ने तत्काल विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। उनके प्रदर्शन को पंजाब की सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (आप) के साथ-साथ शिरोमणि अकाली दल और कांग्रेस जैसे विपक्षी दलों का भी जोरदार समर्थन मिला। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इस फैसले को असंवैधानिक (unconstitutional) करार दिया और स्पष्ट कर दिया कि पंजाब सरकार इस PU Governance Row को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती देने की पूरी तैयारी कर चुकी है।

​मुख्यमंत्री ने कहा था कि यह विश्वविद्यालय केवल एक शैक्षणिक संस्थान नहीं, बल्कि पंजाब की पहचान और विरासत का प्रतीक है। कानूनी चुनौती और बढ़ते राजनीतिक दबाव के कारण केंद्र सरकार बैकफुट पर आ गई।

​विरोध के सामने केंद्र का यू-टर्न

​इस व्यापक राजनीतिक और छात्र विरोध को देखते हुए, केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग ने 4-5 नवंबर 2025 को एक नया राजपत्र नोटिफिकेशन जारी किया। इस नए नोटिफिकेशन ने 28 अक्टूबर को जारी पिछले आदेश को तत्काल प्रभाव से रद्द (rescinded) कर दिया। इस यू-टर्न को विश्वविद्यालय प्रशासन और पंजाब के राजनीतिक गलियारों में एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है।

​पुरानी व्यवस्था बहाल: लोकतंत्र की जीत

​नोटिफिकेशन वापस होने के बाद, पंजाब यूनिवर्सिटी में सीनेट और सिंडिकेट अब अपनी पिछली लोकतांत्रिक संरचना (previous democratic structure) के अनुसार ही कार्य करना जारी रखेंगे। इससे विश्वविद्यालय के प्रशासन में पुरानी स्थिति बहाल (status quo restored) हो गई है, जहाँ निर्वाचित सदस्यों और स्नातक मतदाताओं का प्रतिनिधित्व पहले की तरह बना रहेगा। यह फैसला न केवल PU Governance Row को समाप्त करता है, बल्कि यह भी स्थापित करता है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता को संरक्षित रखना कितना महत्वपूर्ण है।

​यह पूरा घटनाक्रम देश के उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता और प्रशासन में सरकारी दखल की सीमाओं पर एक महत्वपूर्ण सबक है। यह दर्शाता है कि किसी भी बड़े प्रशासनिक बदलाव से पहले सभी हितधारकों (stakeholders) के साथ गहन विचार-विमर्श और सहमति बनाना आवश्यक है, ताकि भविष्य में इस तरह की कोई PU Governance Row उत्पन्न न हो।

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