नोएडा (Uttarakhand Tehelka): नोएडा के निठारी कांड (Nithari case) (2005-2006) के मुख्य आरोपी सुरेंद्र कोली को सुप्रीम कोर्ट द्वारा अंतिम मामले में भी बरी किए जाने के बाद, निठारी कांड के पीड़ितों के परिवारों पर गहरा आघात लगा है। लगभग दो दशकों की लंबी कानूनी लड़ाई और न्याय की उम्मीदों के बाद, देश की सबसे बड़ी अदालत का यह फैसला न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यह उन परिवारों के लिए एक असहनीय सदमा है, जिनकी बच्चियां और बच्चे इस वीभत्स अपराध का शिकार हुए थे।

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​19 साल का संघर्ष और न्यायिक प्रक्रिया का उतार-चढ़ाव

निठारी कांड (Nithari case) देश के सबसे भयानक मामलों में से एक था, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। इस मामले में 19 से अधिक बच्चों और युवा महिलाओं की क्रूरता से हत्या की गई थी, जिनके अवशेष नोएडा के निठारी गांव स्थित डी-5 कोठी के पीछे के नाले से बरामद हुए थे। सुरेंद्र कोली (नौकर) और उसके मालिक मोनिंदर सिंह पंढेर पर दुष्कर्म, हत्या और सबूत मिटाने का आरोप लगा था।

  • शुरुआती जांच और सीबीआई को हस्तांतरण: 2006 में बच्चों के गायब होने की शुरुआती शिकायतें दर्ज की गईं। निठारी कांड (Nithari case) की भयावहता सामने आने पर, उत्तर प्रदेश पुलिस की जांच पर गंभीर सवाल उठे और मामले की गहनता को देखते हुए इसे केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप दिया गया।
  • निचली अदालतों का फैसला: निचली अदालत और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कई मामलों में सुरेंद्र कोली को फांसी की सजा सुनाई थी। निचली अदालतों ने मुख्य रूप से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (Circumstantial Evidence) और कोली के इकबालिया बयान पर भरोसा किया था।
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जांच एजेंसी की विफलता और सुप्रीम कोर्ट का मत

​सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न मामलों की सुनवाई करते हुए, खासकर अंतिम मामले में, सबूतों की कमी और जांच की दोषपूर्ण प्रकृति का हवाला देते हुए कोली को बरी कर दिया। इस फैसले का मुख्य कारण सीबीआई सहित पिछली जांच एजेंसियों की गंभीर विफलताएं थीं:


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  1. वैज्ञानिक साक्ष्यों को सिद्ध करने में विफलता: न्यायालय ने पाया कि सीबीआई द्वारा प्रस्तुत इकबालिया बयान को पुख्ता वैज्ञानिक साक्ष्यों से समर्थित नहीं किया जा सका। निठारी कांड (Nithari case) की जांच में, जांच एजेंसियां घटनास्थल (डी-5 कोठी) और बरामद किए गए अवशेषों के बीच सीधा और अटूट वैज्ञानिक लिंक स्थापित करने में विफल रहीं।
  2. डीएनए प्रोफाइलिंग की कमजोरी: निठारी कांड (Nithari case) में डीएनए प्रोफाइलिंग को लेकर भी गंभीर खामियां पाई गईं। जांच एजेंसियां मृतक बच्चों के माता-पिता के डीएनए से बरामद अवशेषों का निर्णायक और संदेह से परे मिलान अदालत के सामने सिद्ध नहीं कर पाईं, जिससे साक्ष्य कमज़ोर पड़ गए।
  3. साक्ष्य जुटाने में गैर-पेशेवर रवैया: शुरुआत में उत्तर प्रदेश पुलिस और बाद में सीबीआई द्वारा साक्ष्य एकत्र करने में मानक प्रक्रियाओं का पालन न करना एक बड़ी विफलता थी। महत्वपूर्ण साक्ष्यों को ठीक से संरक्षित नहीं किया गया, जिससे वे कानूनी कसौटी पर टिक नहीं पाए।
  4. अपराध की श्रृंखला टूटी: कोर्ट ने तर्क दिया कि जब पंढेर (मालिक) को पहले ही साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया था, तो केवल नौकर कोली को दोषी ठहराने के लिए अपराध की श्रृंखला पूरी नहीं हो पाई। यह जांच एजेंसी की विफलता थी कि वह दोनों आरोपियों के खिलाफ अपराध को संदेह से परे सिद्ध नहीं कर सकी।

​इन न्यायिक कमियों के कारण ही संदेह का लाभ आरोपी को मिला और वह बरी हो गया।

Nithari case के परिवारों की व्यथा और न्याय पर सवाल

निठारी कांड (Nithari case) के पीड़ितों के परिवारों को यह फैसला स्वीकार्य नहीं है और वे गहरे सदमे में हैं।

  • न्याय पर सवाल: 15 वर्षीय बच्ची ज्योति (बदला हुआ नाम) के पिता झब्बू लाल ने रोते हुए मीडिया से कहा, "अगर अपराधी बरी हो गए, तो हमारे बच्चों का कातिल कौन है?" परिवारों का कहना है कि उनकी बच्चियों का कत्ल हुआ, उनके अवशेष मिले, लेकिन कोई भी दोषी नहीं है—यह न्याय नहीं है।
  • मानसिक और सामाजिक आघात: इन परिवारों को दो दशकों तक कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने पड़े। अब, जब दोनों आरोपी सुरेंद्र कोली और मोनिंदर सिंह पंढेर जेल से रिहा हो चुके हैं, तो निठारी कांड (Nithari case) के परिवारों को अपने ही गांव में रहते हुए असुरक्षा और अन्याय की भावना का सामना करना पड़ रहा है।
  • भविष्य की चिंता: निठारी कांड (Nithari case) की यह विफलता देश की न्यायिक प्रक्रिया, खासकर गंभीर आपराधिक मामलों की जांच के तरीके पर गंभीर सवाल खड़े करती है। यह मामला भविष्य में जांच एजेंसियों के लिए एक महत्वपूर्ण सबक है कि साक्ष्यों को किस मजबूती से एकत्र और प्रस्तुत किया जाए ताकि जघन्य अपराधों के दोषियों को सजा मिल सके।

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