पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सबसे प्रमुख और चहल-पहल वाली मंडियों में शुमार मेरठ के शास्त्री नगर स्थित 'सेंट्रल मार्केट' पर आज इतिहास का सबसे बड़ा प्रशासनिक और कानूनी संकट खड़ा है। जो इलाका करीब तीन-चार दशक पहले आम परिवारों के बसने के लिए एक आवासीय योजना के रूप में स्वीकृत हुआ था, वह देखते ही देखते राज्य का एक विशाल व्यावसायिक केंद्र बन गया। लेकिन नियमों की अनदेखी, भू-उपयोग के उल्लंघन और अनिवार्य सेटबैक को घेरकर किए गए अवैध निर्माणों पर जब देश की सबसे बड़ी अदालत का डंडा चला, तो दशकों पुराना यह अवैध कारोबार ताश के पत्तों की तरह ढहने लगा।

​उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद ने 1990 के दशक में शास्त्री नगर के विभिन्न सेक्टरों को मुख्य रूप से मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए रिहायशी कॉलोनी के रूप में बसाया था। समय बीतने के साथ मुख्य सड़कों से लगे रिहायशी मकानों में दुकानें, शोरूम और प्राइवेट क्लीनिक खुलने लगे। धीरे-धीरे लगभग पूरी कॉलोनी व्यावसायिक बाजार 'सेंट्रल मार्केट' का रूप ले चुकी थी।

​आवासीय इलाके में व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ने के साथ गाड़ियों का भारी जाम, शोर, अग्निशमन और हादसों के खतरे पैदा हो गए। इस स्थिति को लेकर स्थानीय निवासियों और आरडब्ल्यूए ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने समय-समय पर अवैध निर्माणों और गैर-आवासीय गतिविधियों पर रोक के निर्देश दिए, लेकिन जमीनी स्तर पर ढिलाई बनी रही। मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुँचा तो शीर्ष अदालत ने आवास विकास परिषद और स्थानीय प्रशासन की सुस्ती पर गंभीर सवाल उठाए। इसके बाद परिषद ने कोर्ट के दबाव में सेंट्रल मार्केट के 44 प्रमुख भवनों को चिह्नित कर सील कर दिया, जिनमें स्वीकृत नक्शों का पूर्ण उल्लंघन कर कॉम्प्लेक्स बनाए गए थे।

​अक्टूबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन में आवास विकास परिषद ने भारी पुलिस बल के साथ सेंट्रल मार्केट में पहला बड़ा ध्वस्तीकरण अभियान चलाकर 22 दुकानों वाले अवैध कमर्शियल कॉम्प्लेक्स को ढहाया था। इसके बाद जुलाई 2026 में न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने 44 सील की गई संपत्तियों में से अनधिकृत निर्माणों को गिराने के आदेश बरकरार रखे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भवन स्वामियों को स्वैच्छिक रूप से अवैध हिस्सा हटाने का मौका दिया जाएगा, वर्ना निकाय स्वयं बुलडोजर चलाकर सारा खर्च मकान मालिकों से वसूलेगा।


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​इसी कड़ी में 16 सितंबर 2026 को सुबह 7 बजे पूरे सेंट्रल मार्केट को छावनी में बदलकर 11 बुलडोजर उतारे गए। परिषद के अनुसार, 44 में से 38 भवन स्वामियों ने कोर्ट के डर से खुद अवैध हिस्से तोड़ने शुरू कर दिए थे, लेकिन जिन 6 भवनों में अमल नहीं हुआ था, उन पर लगातार बुलडोजर चलाकर अवैध हिस्से ध्वस्त कर दिए गए। यह पूरी कवायद 21 सितंबर 2026 की उस निर्णायक तारीख के लिए की गई है, जब आवास विकास परिषद के चेयरमैन को सुप्रीम कोर्ट में अपनी विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट पेश करनी है।

​इस पूरे मामले में सबसे बड़ा पेंच शमन शुल्क के जरिए दुकानों को वैध कराने की व्यापारियों की मांग थी। व्यापारी संगठनों ने तर्क दिया कि वे पिछले 30-35 वर्षों से यहाँ व्यवसाय कर रहे हैं और परिषद को भारी जल-गृह कर चुका रहे हैं। उन्होंने नई भवन उपविधियों के तहत अनुमानित ₹70 करोड़ रुपये तक का शमन शुल्क जमा करके भू-उपयोग परिवर्तन को नियमित करने की गुहार लगाई।

​हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला की पीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि मास्टर प्लान में उल्लंघन करके किए गए अवैध निर्माणों पर शमन शुल्क का सवाल ही नहीं उठता। केवल समय बीत जाने या अधिकारियों की सुस्ती से कोई अवैध निर्माण वैध नहीं बन जाता, क्योंकि सुरक्षा और मानव जीवन सबसे ऊपर है। हादसों में मासूमों की जान जाने जैसी घटनाओं के बाद पैसों के बदले नियमों से समझौता नहीं किया जा सकता।

​इस प्रशासनिक कार्रवाई से शास्त्री नगर के व्यापारी और स्थानीय निवासी भारी संकट में हैं। व्यापार संघों के अनुसार, सेंट्रल मार्केट पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 40,000 लोग आश्रित हैं। दर्जनों इमारतों में संचालित बैंक, डायग्नोस्टिक सेंटर, स्कूल, क्लिनिक और रिटेल शोरूम अचानक सील व ध्वस्त होने से करोड़ों रुपये का व्यापार ठप हो चुका है। ध्वस्तीकरण कार्रवाई के दौरान कई व्यापारी नेताओं को पुलिस द्वारा नजरबंद किए जाने से व्यापार मंडल में भारी आक्रोश है। वहीं, सरकारी बुलडोजर का खर्च वसूलने की चेतावनी के कारण कई व्यापारी खुद ही हथौड़ों से अपनी दुकानों के अवैध हिस्से तोड़ने पर मजबूर दिखे।

​मेरठ के शास्त्री नगर सेंट्रल मार्केट का यह मामला केवल एक शहर की दुकानों के टूटने की कहानी नहीं है, बल्कि यह पूरे देश के नगर निगमों और विकास प्राधिकरणों के लिए सुप्रीम कोर्ट का एक कड़ा संदेश है। कोर्ट के इस सख्त रुख ने साफ कर दिया है कि दशकों की प्रशासनिक ढिलाई और शमन शुल्क के नाम पर नियमों को दरकिनार करने का दौर अब समाप्त हो रहा है। अब सभी की निगाहें 21 सितंबर 2026 की सुप्रीम कोर्ट सुनवाई पर टिकी हैं, जहाँ तय होगा कि इस ऐतिहासिक बाजार और उत्तर प्रदेश के अन्य व्यावसायिक क्षेत्रों का अंतिम भविष्य क्या होगा।

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