Indian Passport: लंदन में बसे एक भारतीय सॉफ्टवेयर डेवलपर कुणाल कुशवाहा ने हाल ही में सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए भारतीय पासपोर्ट की वैश्विक सीमाओं पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। कुणाल का कहना है कि एक अंतरराष्ट्रीय प्रोफेशनल के तौर पर काम करते हुए भारतीय पासपोर्ट उनके जीवन में कोई मूल्य जोड़ने के बजाय केवल बाधाएं उत्पन्न कर रहा है। उन्होंने एक्स पर साझा किया कि पासपोर्ट होने के बावजूद उन्हें हर छोटी यात्रा के लिए जिस तरह की जटिल कागजी कार्रवाई और वीजा प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है, वह किसी मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं है। उनके अनुसार, यह स्थिति इतनी निराशाजनक है कि कई बार लोग यात्रा करने का विचार ही त्याग देना बेहतर समझते हैं।
एक दोस्त के जन्मदिन और वीजा की दीवार का किस्सा
कुणाल ने अपना व्यक्तिगत दुख साझा करते हुए बताया कि वह आयरलैंड में रहने वाले अपने सबसे अच्छे दोस्त के जन्मदिन पर उसे सरप्राइज देना चाहते थे। एक सामान्य स्थिति में वह केवल फ्लाइट टिकट बुक करते और पहुंच जाते, लेकिन भारतीय पासपोर्ट होने के कारण उन्हें सबसे पहले वीजा वेबसाइटों की पेचीदगियों का सामना करना पड़ा। उनकी हालिया जर्मनी यात्रा की वजह से शेंगेन वीजा नियमों के तहत उनके पास जरूरी दिनों की कमी हो गई थी, जिसके कारण वह अपने दोस्त के विशेष दिन पर उसके साथ शामिल नहीं हो सके। कुणाल ने स्पष्ट किया कि उनकी यह असमर्थता पैसों या समय की कमी की वजह से नहीं, बल्कि पासपोर्ट से जुड़ी सीमाओं की वजह से थी।
An Indian passport no longer adds value to my life.
My best friend lives in Ireland. His birthday was recently. A normal thing would be to book a ticket and surprise him. Instead, I opened visa websites.
I was already in Berlin a few days ago. That single detail meant I…— Kunal Kushwaha (@kunalstwt) December 23, 2025
शेंगेन वीजा की तुलना 'फुल-टाइम जॉब' से
यूरोप के शेंगेन क्षेत्र में यात्रा के लिए जरूरी वीजा प्रक्रिया को कुणाल ने एक पूर्णकालिक नौकरी जैसा थकाने वाला काम बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि एक साधारण ट्रिप के लिए भी बैंक स्टेटमेंट, कवर लेटर और होटल बुकिंग जैसे ढेरों दस्तावेजों को बार-बार जमा करना पड़ता है। एयरपोर्ट के अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने कहा कि वहां लंबी कतारों में खड़े होकर दूसरे देशों के नागरिकों को आसानी से निकलते देखना और खुद को दस्तावेजों के फोल्डर के साथ संघर्ष करते पाना बेहद निराशाजनक होता है। उनके मुताबिक, यह केवल उनकी कहानी नहीं है बल्कि उन हजारों भारतीयों की हकीकत है जो वैश्विक स्तर पर काम कर रहे हैं।
बैंकिंग सिस्टम और राष्ट्रीय गौरव पर कड़े सवाल
पासपोर्ट के अलावा कुणाल ने भारत के बैंकिंग और केवाईसी सिस्टम को भी निशाने पर लिया। उन्होंने वर्तमान बैंकिंग प्रक्रियाओं को पुराने दशक का बताते हुए कहा कि आज भी भारतीयों को अंतहीन कागजी कार्रवाई और फॉलो-अप के चक्कर लगाने पड़ते हैं। अपनी बात समाप्त करते हुए उन्होंने साफ किया कि यह मुद्दा देशभक्ति का नहीं बल्कि प्रशासनिक परेशानियों का है। कुणाल का मानना है कि जब कोई व्यक्ति ग्लोबली काम करता है, तो उसके पास ऐसा पासपोर्ट होना चाहिए जो उसका समय बचाए, न कि उसकी दिमागी क्षमता को सीमित करे। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि राष्ट्रीय गौरव कभी भी ग्लोबल मोबिलिटी (वैश्विक गतिशीलता) का विकल्प नहीं बन सकता।