बांग्लादेश में हाल के दिनों में उपजी अस्थिरता और बढ़ती कट्टरपंथी विचारधारा ने एक ऐसा अमानवीय मोड़ ले लिया है, जिसने पूरी मानवता को झकझोर कर रख दिया है। एक सात साल की मासूम बच्ची को कट्टरपंथियों द्वारा जिंदा जला देने की खबर ने न केवल वहां के अल्पसंख्यकों के मन में दहशत पैदा कर दी है, बल्कि दुनिया भर के सभ्य समाज के सामने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह घटना उस नफरत का चरम रूप है, जहाँ एक अबोध बच्ची, जिसे न तो राजनीति की समझ थी और न ही वैचारिक मतभेदों का ज्ञान, उसे केवल उसकी पहचान या कट्टरपंथियों के उन्माद की वेदी पर चढ़ा दिया गया।

​यह दर्दनाक हादसा महज एक अपराध नहीं है, बल्कि उस बढ़ती असहिष्णुता का प्रतीक है जो वर्तमान में बांग्लादेश के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर रही है। पिछले कुछ समय से वहां जिस तरह की अराजकता देखी गई है, उसने कट्टरपंथी तत्वों को खुली छूट दे दी है। जब कानून का डर खत्म हो जाता है और भीड़ तंत्र हावी होने लगता है, तो सबसे पहले शिकार कमजोर और मासूम होते हैं। इस बच्ची के साथ हुई क्रूरता यह स्पष्ट करती है कि हमलावरों का उद्देश्य अब केवल राजनीतिक विरोध नहीं है, बल्कि एक विशिष्ट समुदाय के भीतर गहरे तक डर और असुरक्षा का भाव भरना है ताकि वे अपने ही देश में बेगाने महसूस करने लगें।

​प्रशासनिक स्तर पर इस तरह की घटनाओं का होना अंतरिम व्यवस्था की विफलता को भी उजागर करता है। जब समाज के सबसे सुरक्षित समझे जाने वाले हिस्से यानी बच्चों पर इस तरह के जानलेवा हमले होते हैं, तो यह मानवाधिकारों की सरेआम धज्जियां उड़ने जैसा है। वैश्विक समुदाय और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के लिए भी यह एक चेतावनी है कि वे केवल बयानों तक सीमित न रहें, बल्कि धरातल पर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए दबाव बनाएं।

​इस घटना ने बांग्लादेश के उदारवादी तबके को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या उनका देश उस रास्ते पर जा रहा है जहाँ से वापसी संभव नहीं होगी। अगर नफरत की इस आग को समय रहते नहीं बुझाया गया और दोषियों को ऐसी सजा नहीं दी गई जो नजीर बन सके, तो यह आग पूरे क्षेत्र की शांति को निगल सकती है। यह समय केवल शोक मनाने का नहीं, बल्कि उस विचारधारा के खिलाफ एकजुट होने का है जो मासूमियत को जलाने की हिमाकत करती है।


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