ईरान की फिजाओं में इस वक्त बारूद और आंसुओं की गंध घुली हुई है। महंगाई के खिलाफ शुरू हुआ जनआक्रोश अब एक पूर्ण विद्रोह का रूप ले चुका है। अयातुल्लाह अली खामेनेई की सरकार ने इस बगावत को कुचलने के लिए अपनी सबसे खूंखार ढाल यानी बासिज अर्द्धसैनिक बल को खुली छूट दे दी है। जुमे की नमाज के बाद खामेनेई के सख्त तेवरों ने साफ कर दिया कि ईरान की सत्ता किसी भी कीमत पर झुकने को तैयार नहीं है। उन्होंने इस पूरे प्रदर्शन को अमेरिका की साजिश करार देते हुए अपनी सेना को सड़कों पर लहू बहाने का परोक्ष आदेश दे दिया है। इसके बाद से ही ईरान के अलग-अलग शहरों से रूह कंपा देने वाली तस्वीरें सामने आ रही हैं, जहां वर्दीधारी और सादे कपड़ों में मौजूद बासिज के जवान निहत्थे नागरिकों पर कहर बनकर टूट रहे हैं।
क्रांति की रक्षा के नाम पर दमन का इतिहास
बासिज महज़ एक सैन्य टुकड़ी नहीं है, बल्कि यह कट्टरपंथी विचारधारा का वह हथियार है जिसे 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद खास तौर पर आंतरिक विद्रोहों को दबाने के लिए तराशा गया था। 'लामबंदी' के अर्थ वाला यह संगठन सीधे तौर पर रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के इशारों पर नाचता है। इसमें शामिल ग्रामीण और कट्टरपंथी पृष्ठभूमि के लोग इसे एक पवित्र युद्ध की तरह देखते हैं। इतिहास गवाह है कि 2009 और 2022 में भी जब ईरान की जनता ने अपनी आजादी और अधिकारों के लिए आवाज उठाई थी, तब इसी बासिज ने सड़कों को प्रदर्शनकारियों के खून से लाल कर दिया था। आज एक बार फिर वही मंजर दोहराया जा रहा है, जहां मस्जिदें अब इबादत के साथ-साथ इस संगठन के नियंत्रण कक्ष में तब्दील हो चुकी हैं।
राष्ट्रपति की लाचारी और ट्रंप की सीधी चेतावनी
ईरान के मौजूदा राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन एक तरफ प्रदर्शनकारियों की मांगों को जायज ठहरा रहे हैं, तो दूसरी तरफ दंगाईयों के नाम पर हो रहे कत्लेआम को रोकने में नाकाम दिख रहे हैं। सत्ता के गलियारों में मची इस खींचतान के बीच आम नागरिक पीस रहा है। मानवाधिकार संस्था एचआरएएनए की रिपोर्ट बताती है कि मरने वालों का आंकड़ा 500 को पार कर गया है। इस बीच, अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मंच पर भी हलचल तेज हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को सीधी चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर निर्दोष नागरिकों पर अत्याचार नहीं थमा, तो अमेरिका सैन्य हस्तक्षेप से पीछे नहीं हटेगा। ट्रंप का यह बयान ईरान की आग में घी डालने का काम कर रहा है, जिससे पूरा मध्य पूर्व एक बड़े सैन्य टकराव की मुहाने पर खड़ा नजर आ रहा है।
ईरान का भविष्य और वैश्विक मानवाधिकारों की बलि
बासिज की इस क्रूरता ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। अमेरिका ने पहले ही इस संगठन और इसके कमांडरों पर कड़े प्रतिबंध लगा रखे हैं, लेकिन खामेनेई की जिद के आगे ये पाबंदियां बेअसर दिख रही हैं। बासिज के करीब दो करोड़ स्वयंसेवकों का नेटवर्क ईरान के हर घर और गली पर नजर रखे हुए है। यह संगठन असहमति की हर आवाज को हिंसक तरीके से खामोश करने में माहिर है। फिलहाल ईरान की सड़कों पर जो जंग छिड़ी है, वह सिर्फ महंगाई के खिलाफ नहीं है, बल्कि वह उस तानाशाही और कट्टरपंथ के खिलाफ है जो दशकों से ईरानी आवाम का दम घोंट रही है। अब देखना यह है कि क्या बासिज की बंदूकें जनता के हौसले को तोड़ पाएंगी या यह चिंगारी ईरान की सत्ता का तख्तापलट कर देगी।
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