सात साल बाद चीन के राष्ट्रपति का भारत आना और पिछले दो सालों में दोनों देशों के बड़े नेताओं की यह तीसरी मुलाकात साफ बताती है कि रिश्तों पर जमी बर्फ अब पिघल रही है। साल 2020 में गलवान घाटी की घटना के बाद भारत और चीन के रिश्ते काफी बिगड़ गए थे, लेकिन अब दोनों देश रिश्तों को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं। चीन के राष्ट्रपति का यह कहना कि बातचीत का सिलसिला जारी रहना चाहिए और हमारे प्रधानमंत्री का यह साफ मैसेज कि सीमा पर शांति के बिना रिश्ते आगे नहीं बढ़ सकते, यह दिखाता है कि दोनों देश ज़मीनी सच्चाई को समझ रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब दोनों देश बात करने को तैयार हैं, तो क्यों न सबसे पहले उस पुरानी सीमा समस्या को सुलझाया जाए जिसने सालों से दोनों के बीच दूरियाँ बढ़ा रखी हैं।
2020 के बाद लगभग चार सालों तक पूर्वी लद्दाख की भीषण ठंड में दोनों देशों के सैनिक आमने-सामने डटे रहे। 21 अक्टूबर 2024 को देपसांग और डेमचोक में गश्त (पेट्रोलिंग) को लेकर जो समझौता हुआ, उससे बड़ी राहत मिली। इसके बाद तनाव वाली जगहों से सैनिक पीछे हटे और सरकार के मुताबिक उस समझौते को लागू भी कर दिया गया है। लेकिन हमें यह समझना होगा कि सेना का पीछे हटना और पूरे सीमा विवाद का हमेशा के लिए हल होना, दो अलग बातें हैं। लगभग 3,800 किलोमीटर लंबी सीमा पर जब तक आखिरी लकीर नहीं खिंच जाती, तब तक छोटी सी गलतफहमी भी बड़े विवाद का रूप ले सकती है।
इसलिए अब समय आ गया है कि सीमा की सुरक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ सेना के अफसरों की बातचीत तक सीमित न रहे। दोनों देशों को मिलकर सीमा संभालने का एक पक्का और साफ-सुथरा सिस्टम बनाना चाहिए। इसमें कुछ बहुत आसान और जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं। पहला, सीमा पर तैनात कमांडरों के बीच तुरंत बात करने के लिए हॉटलाइन हो। दूसरा, गश्त करने के नियम लिखित में साफ-साफ तय हों। तीसरा, सीमा के पास कोई भी नई सड़क, पुल या निर्माण करने से पहले एक-दूसरे को जानकारी दी जाए। और चौथा, अगर सीमा पर कोई अनहोनी हो जाए, तो 24 घंटे के अंदर बड़े नेताओं और सैन्य अफसरों की साझा टीम मामले को संभाल ले।
दुनिया में कई देशों ने अपने सीमा विवादों को इसी तरह बातचीत और पक्के नियमों के सहारे संभाला है। जब तक कोई पक्का राजनीतिक हल नहीं निकलता, तब तक शांति बनाए रखने का यही सबसे आसान तरीका है। सीमा पर तनाव रहने से आसपास रहने वाले लोगों, वहां के कारोबार और दोनों देशों की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ता है। जब सीमा पर अनिश्चितता होती है, तो देश का पैसा और संसाधन विकास के बजाय सुरक्षा में ज्यादा लगाने पड़ते हैं।
अंग्रेज़ों के ज़माने से चला आ रहा यह सीमा विवाद अगर सालों से नहीं सुलझा, तो इसका मतलब यह नहीं कि इसे आगे भी ऐसे ही छोड़ दिया जाए। सीमा का पक्का निपटारा होने में भले ही समय लगे, लेकिन शांति की शुरुआत आज के बेहतर इंतज़ामों से हो सकती है। दोनों देशों को अब इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, ताकि सीमा पर शांति रहे और दोनों देश अपने लोगों की तरक्की पर ध्यान दे सकें।
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