देहरादून। उत्तराखंड, जिसे 'देवभूमि' कहा जाता है, अपनी घनी हरियाली और समृद्ध वन्यजीवों के लिए प्रसिद्ध है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में इस शांत प्रदेश में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में अप्रत्याशित वृद्धि देखी गई है, जिसका मुख्य केंद्र रहे हैं हिमालयी काला भालू (Asiatic Black Bear)। भालुओं के रिहायशी इलाकों में घुसने और मनुष्यों पर आक्रामक हमले करने की घटनाओं ने न केवल स्थानीय निवासियों में डर पैदा किया है, बल्कि वन्यजीव विशेषज्ञों को भी इस गंभीर समस्या के मूल कारणों पर विचार करने के लिए मजबूर किया है।

​शीत निद्रा में खलल और भोजन का संकट

​भालुओं का व्यवहारिक पैटर्न मुख्यतः उनके शीत निद्रा (Hibernation) के चक्र पर निर्भर करता है। सर्दियों में कठोर मौसम और भोजन की कमी से बचने के लिए भालू लंबी नींद में चले जाते हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण अब हिमालयी क्षेत्रों में सर्दियों की तीव्रता कम हो गई है और बर्फबारी भी अनिश्चित हो गई है। तापमान में यह बदलाव भालुओं की जैविक घड़ी को भ्रमित कर रहा है, जिससे उनकी शीत निद्रा या तो अधूरी रह जाती है या वे उसमें जा ही नहीं पाते। पूरी तरह से नींद न लेने के कारण भालुओं में चिड़चिड़ापन और आक्रामकता बढ़ जाती है।

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​इसके साथ ही, वनों में प्राकृतिक भोजन की कमी भी एक बड़ा कारण है। जंगलों में बार-बार लगने वाली आग, बेतरतीब निर्माण, और जैव विविधता का नुकसान उनके भोजन के स्रोतों को सीमित कर रहा है। भोजन की तलाश में ये जानवर मजबूरन मानवीय बस्तियों की ओर रुख कर रहे हैं, जहां उन्हें कूड़ेदानों और कृषि उपजों में आसान शिकार मिल जाता है। इसी मुठभेड़ के कारण हमलों की संख्या में खतरनाक इजाफा हुआ है।


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​चार साल पहले भी यही थे हालात: एक दोहराई गई चुनौती

​यह समस्या कोई नई नहीं है। वन्यजीव विशेषज्ञ और वन विभाग के रिकॉर्ड बताते हैं कि चार साल पहले भी यही थे हालात। वर्ष 2021-2022 के आसपास भी भालुओं के आक्रामक व्यवहार और मानव बस्तियों में घुसपैठ की कई घटनाएं दर्ज की गई थीं। उस समय भी विशेषज्ञों ने अनियमित शीत निद्रा और जंगल में घटते भोजन को ही मुख्य वजह बताया था। मौजूदा समय में, उत्तराखंड के चमोली, पौड़ी और अल्मोड़ा जैसे पहाड़ी जिलों से लगातार हमले की खबरें आ रही हैं। भालुओं ने खेतों में काम कर रहे किसानों और मवेशियों को चरा रहे ग्रामीणों को निशाना बनाया है, जिससे कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं और कुछ की मौत भी हुई है।

​यह सिलसिला एक स्पष्ट संकेत है कि समस्या के स्थायी समाधान के लिए उठाए गए कदम नाकाफी रहे हैं।

​समाधान की ओर: दीर्घकालिक रणनीति की आवश्यकता

​इस दोहराई गई चुनौती का समाधान केवल तात्कालिक उपायों से संभव नहीं है। भालुओं के व्यवहार और आवास पर वैज्ञानिक अध्ययन को प्राथमिकता देनी होगी। वनों में फलदार वृक्षों का रोपण और उनके प्राकृतिक भोजन स्रोतों की बहाली आवश्यक है। इसके अलावा, मानव बस्तियों के आसपास कूड़े का उचित प्रबंधन और लोगों को वन्यजीवों के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए जागरूक करना समय की मांग है। उत्तराखंड को अपने वन्यजीव संरक्षण की रणनीति में दीर्घकालिक स्थिरता लानी होगी, ताकि देवभूमि में मनुष्य और भालू दोनों ही सुरक्षित रह सकें।

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