• देवभूमि से लेकर दिल्ली तक CBI जांच की गूंज
  • रसूखदारों को बचाने की कोशिशों पर बिफरी जनता!

उत्तराखंड की शांत वादियों में न्याय की गूँज अब एक गगनभेदी गर्जना बन चुकी है। अंकिता भंडारी हत्याकांड ने प्रदेश की आत्मा को झकझोर कर रख दिया है और आज राजधानी देहरादून का परेड ग्राउंड उस जनाक्रोश का केंद्र बना, जिसे दबा पाना अब शासन-प्रशासन के बस की बात नहीं दिख रही। यह केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि व्यवस्था के खिलाफ एक खुली चुनौती थी। प्रदर्शन में शामिल होने वाले लोगों का जज्बा ऐसा था कि क्या बच्चा और क्या बुजुर्ग, हर कोई अपनी निजी व्यस्तताओं को छोड़कर इंसाफ की मशाल थामे नजर आया। प्रदर्शनकारियों की आंखों में व्यवस्था के प्रति गहरा अविश्वास और दोषियों के प्रति भयंकर क्रोध साफ झलक रहा था। खून से लिखी चिट्ठियां और आसमान चीरते नारे इस बात की गवाही दे रहे थे कि उत्तराखंड की बेटी को न्याय दिलाने के लिए अब जनता किसी भी हद तक जाने को तैयार है।

उस रहस्यमयी VVIP का चेहरा बेनकाब करने की जिद

​इस पूरे आंदोलन की सबसे बड़ी और चुभती हुई मांग उस 'वीआईपी' के नाम का खुलासा है, जिसका जिक्र इस केस की शुरुआत से ही किया जा रहा है। प्रदर्शनकारियों का सीधा आरोप है कि सत्ता की गलियारों में कोई ऐसा रसूखदार बैठा है जिसे बचाने के लिए पूरी सरकारी मशीनरी ढाल बनी हुई है। उर्मिला सनावार द्वारा किए गए दावों ने आग में घी का काम किया है। अब जनता यह पूछ रही है कि आखिर वह कौन सा सफेदपोश है जिसके लिए एक मासूम बेटी की जान की कोई कीमत नहीं थी? प्रदर्शन में शामिल युवाओं ने चेतावनी दी है कि जब तक उस रसूखदार के फोन रिकॉर्ड्स की जांच नहीं होती और उसका नाम सार्वजनिक नहीं किया जाता, तब तक इसे निष्पक्ष जांच नहीं माना जाएगा। रसूखदारों को संरक्षण देने की कोशिशों ने सरकार की साख पर भी गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।

CBI जांच और फांसी की सजा से कम कुछ भी नहीं

​आंदोलनकारियों का स्पष्ट संदेश है कि अब तक की पुलिसिया जांच और एसआईटी की कार्यप्रणाली से जनमानस का विश्वास उठ चुका है। जिस तरह से महत्वपूर्ण साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की खबरें आईं, उसने जनता को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि स्थानीय तंत्र पर भारी दबाव है। यही कारण है कि आज परेड ग्राउंड से लेकर सोशल मीडिया तक, हर तरफ केवल एक ही मांग गूंज रही है और वह है सीबीआई जांच। लोग चाहते हैं कि देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी इस मामले की कमान संभाले ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। इसके साथ ही दोषियों के लिए किसी भी तरह की रियायत को जनता बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। प्रदर्शनकारियों ने दो टूक शब्दों में कहा है कि अंकिता के हत्यारों को फांसी के फंदे तक पहुंचाना ही इस आंदोलन का अंतिम लक्ष्य है।

कलाकारों की हुंकार और व्यवस्था को अंतिम चेतावनी

​इस न्याय युद्ध में अब उत्तराखंड के सांस्कृतिक पहरेदारों ने भी मोर्चा संभाल लिया है। लोक गायक इंदर आर्या समेत प्रदेश के तमाम नामचीन कलाकारों ने एकजुट होकर सरकार को चेतावनी दी है कि वे अब खामोश नहीं बैठेंगे। कलाकारों का इस तरह मुखर होना यह दर्शाता है कि यह मामला अब केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि उत्तराखंड की अस्मिता का प्रश्न बन चुका है। प्रदर्शनकारियों ने सरकार को अल्टीमेटम दिया है कि यदि उनकी मांगों पर तत्काल ठोस कार्रवाई नहीं हुई और उस रहस्यमयी वीआईपी को बेनकाब नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में यह आंदोलन उग्र रूप धारण करेगा जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन की होगी। देवभूमि की जनता अब अपनी बेटी के बलिदान को बेकार नहीं जाने देगी और न्याय मिलने तक यह संघर्ष जारी रहेगा।


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