बाजपुर के केलाखेड़ा क्षेत्र के बुजुर्ग महिला परमजीत कौर के प्रकरण की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि मुंडिया पिस्तौर निवासी संजय बंसल ने एसडीएम अमृता शर्मा के द्वार पर दस्तक देकर सत्ता पक्ष के करीबियों पर जमीन हड़पने के सनसनीखेज आरोप जड़ दिए हैं। पीड़ित का कहना है कि जिस जमीन को उन्होंने महज देखभाल के लिए जयप्रकाश तिवारी नामक व्यक्ति को सौंपा था आज उसी जमीन पर राजनीतिक संरक्षण के चलते पक्का निर्माण किया जा रहा है।
फर्जीवाड़े का जाल और अपनों की गवाही
संजय बंसल द्वारा लगाए गए आरोपों की फेहरिस्त काफी लंबी और चौंकाने वाली है। उन्होंने सीधे तौर पर आरोप लगाया है कि जयप्रकाश तिवारी ने देवानंद पांडेय के साथ मिलकर एक गहरी साजिश रची और उनकी कीमती भूमि पर कब्जा करने के लिए जाली स्टाम्प पेपर तैयार किए। इस षड्यंत्र को मजबूती देने के लिए गवाह भी उन्हीं के परिवार के लोगों को बनाया गया ताकि कोई बाहरी व्यक्ति बीच में न आ सके। पीड़ित का स्पष्ट कहना है कि वर्ष 2025 में जब जमीन पर अवैध निर्माण शुरू हुआ और उन्होंने इसका विरोध किया तो उन्हें न्याय के बदले जान से मारने की धमकियां मिलीं। आरोपियों का यह कहना कि सरकार और विधायक उनके अपने हैं प्रशासन की कार्यशैली को संदिग्ध बना देता है।
दबाव में प्रशासन और ठंडे बस्ते में जांच
हैरानी की बात यह है कि इस प्रकरण में प्राधिकरण की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है। संजय बंसल का दावा है कि पूर्व में तहसीलदार और चकबंदी अधिकारी सहित राजस्व विभाग की पूरी टीम ने भूमि का चिन्हांकन किया था और रिपोर्ट पीड़ित के पक्ष में आई थी। प्राधिकरण द्वारा उन्हें अवैध निर्माण को लेकर नोटिस भी जारी किया था लेकिन जैसे ही मामला रसूखदारों से जुड़ा वैसे ही पूरी फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। पीड़ित का यह आरोप बेहद गंभीर है कि राजनीतिक दबाव के कारण प्राधिकरण ने आधे हिस्से को तो सील किया लेकिन बाकी का हिस्सा आरोपियों के लिए खुला छोड़ दिया। एक तरफ पीड़ित खुद निर्माण तोड़ने का शपथ पत्र दे रहा है और दूसरी तरफ प्रशासन की चुप्पी सत्ता के दबाव की कहानी खुद बयां कर रही है।
न्याय की उम्मीद या आमरण अनशन का रास्ता
वर्तमान में एसडीएम अमृता शर्मा ने पीड़ित को जांच के बाद उचित कार्रवाई का भरोसा जरूर दिया है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही नजर आती है। संजय बंसल का कहना है कि वे पूर्व में भी कई बार शिकायतें कर चुके हैं परंतु हर बार उन्हें कोरे आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला। अब उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा है और इसीलिए उन्होंने प्रशासन को अल्टीमेटम दिया है कि यदि जल्द ही उनकी भूमि को कब्जा मुक्त नहीं कराया गया और दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई तो वे आमरण अनशन पर बैठने को मजबूर होंगे। अब देखना यह होगा कि क्या एसडीएम अमृता शर्मा इस राजनीतिक चक्रव्यूह को तोड़कर एक आम आदमी को उसका अधिकार दिला पाती हैं या सत्ता की हनक के आगे एक बार फिर न्याय दम तोड़ देगा।
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