बांग्लादेश की राजनीति में आगामी 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव से पहले ही लोकतंत्र की साख पर बड़े सवाल खड़े होने लगे हैं। ताज़ा मामला गोपालगंज-3 संसदीय क्षेत्र का है, जिसे पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पारंपरिक सीट माना जाता रहा है। यहाँ से निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनावी मैदान में उतरे हिंदू नेता गोबिंद चंद्र प्रमाणिक का नामांकन शनिवार को रिटर्निंग ऑफिसर ने नाटकीय ढंग से खारिज कर दिया। यह घटना न केवल चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाती है, बल्कि पड़ोसी मुल्क में अल्पसंख्यकों की राजनीतिक भागीदारी को कुचलने के प्रयासों की ओर भी इशारा करती है।

षड्यंत्र या प्रक्रियात्मक चूक: नामांकन के पीछे का असली खेल

गोबिंद चंद्र प्रमाणिक, जो पेशे से एक वकील हैं और बांग्लादेश जातीय हिंदू महाजोत जैसे प्रभावशाली संगठन के महासचिव भी हैं, उन्होंने चुनाव लड़ने की पूरी तैयारी कर रखी थी। बांग्लादेशी कानून के अनुसार, किसी भी निर्दलीय उम्मीदवार को अपने क्षेत्र के एक प्रतिशत मतदाताओं के समर्थन वाले हस्ताक्षर जमा करने होते हैं। गोबिंद चंद्र ने यह कानूनी प्रक्रिया पूरी कर ली थी, लेकिन मामला तब बिगड़ा जब अचानक उन्हीं मतदाताओं ने रिटर्निंग ऑफिसर के सामने पेश होकर अपने हस्ताक्षरों को फर्जी बता दिया। यह तर्क गले नहीं उतरता कि बड़ी संख्या में मतदाता अचानक अपना रुख बदल लें, जिससे यह स्पष्ट होता है कि पर्दे के पीछे कोई गहरी साजिश रची गई है।

दबाव की राजनीति और मतदाताओं को डराने का गंभीर आरोप

गोबिंद चंद्र ने इस पूरे घटनाक्रम के लिए खालिदा जिया की पार्टी 'बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी' यानी बीएनपी को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया है। उनका आरोप है कि बीएनपी के कार्यकर्ताओं ने उन मतदाताओं को डराया-धमकाया जिन्होंने उनके नामांकन का समर्थन किया था। जान का डर दिखाकर मतदाताओं को रिटर्निंग ऑफिसर के पास ले जाया गया और उनसे झूठा बयान दिलवाया गया कि उन्होंने हस्ताक्षर नहीं किए हैं। रिटर्निंग ऑफिसर ने भी बिना किसी गहन जांच के उन हस्ताक्षरों को अमान्य घोषित कर दिया और गोबिंद चंद्र का पर्चा वापस कर दिया। यह सीधे तौर पर एक उम्मीदवार को चुनावी प्रक्रिया से बाहर करने की सोची-समझी रणनीति प्रतीत होती है।


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अल्पसंख्यक मतदाताओं की निर्णायक भूमिका और सत्ता का डर

गोपालगंज-3 सीट का जनसांख्यिकीय गणित काफी दिलचस्प है। यहाँ के लगभग तीन लाख मतदाताओं में से आधे से अधिक, यानी करीब इक्यावन प्रतिशत आबादी हिंदू समुदाय की है। गोबिंद चंद्र का दावा है कि उनकी मजबूत पकड़ और जातीय समीकरणों के कारण बीएनपी को अपनी हार निश्चित नजर आ रही थी। यदि एक हिंदू नेता इस सीट से चुनाव लड़ता, तो बीएनपी के लिए जीत की राह लगभग बंद हो जाती। इसी चुनावी समीकरण को बिगाड़ने के लिए उनकी उम्मीदवारी पर प्रहार किया गया है। वर्तमान में जो हालात बने हैं, उससे ऐसा लगता है कि बांग्लादेश में विपक्ष अब केवल उन्हीं चेहरों को मैदान में देखना चाहता है जो उनके एजेंडे में फिट बैठते हों।

न्याय की उम्मीद और भविष्य की कानूनी लड़ाई

इस अन्यायपूर्ण फैसले के खिलाफ गोबिंद चंद्र प्रमाणिक ने अब चुनाव आयोग और जरूरत पड़ने पर उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की चेतावनी दी है। उनका कहना है कि वह इतनी आसानी से हार नहीं मानेंगे और हिंदू समाज की आवाज को चुनावी पटल पर रखने के लिए हर संभव कानूनी रास्ता अख्तियार करेंगे। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लोकतंत्र की दुहाई देने वाले बांग्लादेश के लिए यह घटनाक्रम किसी शर्मिंदगी से कम नहीं है। यदि एक लोकप्रिय नेता को केवल तकनीकी आधार पर और डरा-धमकाकर नामांकन से रोक दिया जाता है, तो आगामी 12 फरवरी को होने वाले चुनाव की निष्पक्षता पर दुनिया भर की निगाहें टिकी रहेंगी।

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