उत्तराखंड की राजधानी देहरादून आज एक बार फिर अंकिता भंडारी हत्याकांड की गूँज से दहल उठी। परेड मैदान में आयोजित विशाल महापंचायत ने यह स्पष्ट कर दिया कि वक्त बीतने के साथ अंकिता को न्याय दिलाने की लौ कम होने के बजाय और अधिक प्रज्वलित हुई है। अंकिता भंडारी हत्याकांड न्याय यात्रा के समापन पर जुटे संयुक्त संघर्ष मंच और विभिन्न सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं ने हुंकार भरते हुए कहा कि यह लड़ाई अब केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह पूरे प्रदेश की अस्मिता और सुरक्षा का सवाल बन चुकी है। परेड मैदान में जुटी भारी भीड़ ने नारेबाजी के जरिए सरकार और प्रशासन तक अपनी बात पहुँचाई कि पारदर्शी जांच के बिना यह आंदोलन थमने वाला नहीं है।
भावुक हुए परिजन और वीआईपी एंगल पर तीखे सवाल
महापंचायत का दृश्य उस समय बेहद भावुक हो गया जब अंकिता के माता-पिता मंच पर उपस्थित हुए। अपनी बेटी को खोने का दर्द उनकी आंखों में साफ झलक रहा था, लेकिन न्याय की उम्मीद ने उन्हें टूटने नहीं दिया। परिजनों के साथ-साथ वक्ताओं ने बार-बार उस 'वीआईपी' का नाम सार्वजनिक करने की मांग उठाई, जिसके इर्द-गिर्द इस पूरी वारदात की साजिश बुनी गई थी। संयुक्त संघर्ष मंच की संरक्षक कमला पंत ने कड़े शब्दों में आरोप लगाया कि अब तक की जांच में कई महत्वपूर्ण सवालों को अनसुलझा छोड़ दिया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक उस रसूखदार व्यक्ति का नाम सामने नहीं आता, जिसके लिए अंकिता पर दबाव बनाया गया था, तब तक न्याय की प्रक्रिया को अधूरा ही माना जाएगा।
राजनीतिक जगत की मौजूदगी और जांच पर अविश्वास
इस महापंचायत में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत सहित कई राजनीतिक चेहरों की उपस्थिति ने मामले की गंभीरता को और बढ़ा दिया। हरीश रावत ने जनता की आवाज में अपनी आवाज मिलाते हुए कहा कि पूरा प्रदेश आज भी सच के सामने आने की प्रतीक्षा कर रहा है। मंच से वक्ताओं ने वर्तमान व्यवस्था पर अविश्वास जताते हुए मांग की कि अंकिता के माता-पिता द्वारा दिए गए शिकायती पत्र को ही आधार मानकर मामले की सीबीआई जांच शुरू की जानी चाहिए। साथ ही, जांच के दायरे को बढ़ाते हुए उन प्रभावशाली लोगों की भूमिका की भी पड़ताल की मांग की गई जो अब तक कानून की पहुंच से बाहर बने हुए हैं।
पंद्रह दिनों का अल्टीमेटम और भविष्य की रणनीति
महापंचायत में सरकार के समक्ष कड़े प्रस्ताव रखे गए, जिसमें सीधे तौर पर चेतावनी दी गई कि यदि अगले पंद्रह दिनों के भीतर पीड़ित परिवार की शिकायतों पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो आंदोलन को और अधिक उग्र रूप दिया जाएगा। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि वे राष्ट्रपति से मुलाकात कर न्याय की गुहार लगाएंगे और जरूरत पड़ी तो दोबारा महापंचायत का आयोजन किया जाएगा। प्रस्ताव में यह भी मांग की गई कि मामले से जुड़े सत्ताधारी दल के नेताओं को पूरी तरह जांच के दायरे में लाया जाए और किसी भी व्यक्ति को उसके रसूख के कारण छूट न मिले। यह महापंचायत महज एक सभा नहीं, बल्कि व्यवस्था के खिलाफ जनता के गुस्से का एक ऐसा दस्तावेज साबित हुई है जो आने वाले दिनों में सरकार की मुश्किलें बढ़ा सकती है।
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