उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने भ्रष्टाचार और कार्यप्रणाली में शिथिलता बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ अपनी 'जीरो टॉलरेंस' नीति को एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है। ताजा मामला चंदौली जिले के पंडित दीन दयाल नगर (मुगलसराय) से जुड़ा है, जहां तहसील प्रशासन की नाक के नीचे बेशकीमती सरकारी जमीनों को निजी हाथों में सौंपने का बड़ा खेल खेला गया। शासन ने इस गंभीर अनियमितता के दोषी पाए गए तीन अधिकारियों लालता प्रसाद, सतीश कुमार और विराग पांडेय को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। वर्तमान में ये अधिकारी क्रमशः गाजियाबाद, एटा और बुलंदशहर में उप जिलाधिकारी के महत्वपूर्ण पदों पर तैनात थे, जिन्हें अब राजस्व परिषद से संबद्ध कर दिया गया है।

तहसीलदार के कार्यकाल में हुआ करोड़ों का खेल

​यह पूरा प्रकरण उस समय का है जब ये तीनों अधिकारी पंडित दीन दयाल नगर तहसील में तहसीलदार के पद पर कार्यरत थे। आरोप है कि इन अधिकारियों ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए सार्वजनिक उपयोग की जमीनों जैसे खलिहान, चकमार्ग, कब्रिस्तान और बंजर भूमि पर अवैध कब्जा करने वालों को संरक्षण दिया। जांच में यह तथ्य सामने आया कि जिन मामलों में पहले ही बेदखली के आदेश पारित हो चुके थे और वसूली के लिए आरसी जारी की जा चुकी थी, उन्हें इन अधिकारियों ने पीठासीन अधिकारी की हैसियत से नियमों को ताक पर रखकर पलट दिया। गुपचुप तरीके से वसूली आदेश वापस लेकर अवैध कब्जेदारों के पक्ष में फैसले सुनाए गए, जिससे राज्य सरकार को राजस्व की भारी क्षति हुई।

जिलाधिकारी की जांच रिपोर्ट ने खोली पोल

​इस बड़े घोटाले का पर्दाफाश तब हुआ जब चंदौली के जिलाधिकारी चंद्रमोहन गर्ग ने पुरानी पत्रावलियों का गहन निरीक्षण किया। फाइलों के पन्ने पलटने पर डीएम को अहसास हुआ कि कई गंभीर मामलों में पूर्व में जारी आदेशों के विपरीत जाकर राहत दी गई है। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए डीएम ने एडीएम न्यायिक, एसडीएम चकिया और एसडीएम चंदौली की एक उच्चस्तरीय जांच समिति गठित की। इस समिति ने जब दस्तावेजों को खंगाला तो चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई कि इन तीनों अधिकारियों ने दुर्भावनापूर्ण तरीके से गांव समाज की संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया और भू-माफियाओं को लाभ पहुंचाया। जिलाधिकारी की इसी जांच रिपोर्ट और कार्रवाई की संस्तुति पर शासन ने कड़ा फैसला लेते हुए तीनों की सेवा को निलंबित करने का आदेश जारी किया।

प्रशासनिक खेमे में हड़कंप और भविष्य की राह

​प्रमुख सचिव नियुक्ति एवं कार्मिक एम देवराज द्वारा जारी निलंबन आदेश ने प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में खलबली मचा दी है। यह कार्रवाई स्पष्ट संदेश देती है कि यदि राजस्व अधिकारी अपने न्यायिक अधिकारों का उपयोग सरकारी हितों के विरुद्ध करेंगे, तो वे दंड से नहीं बच पाएंगे। निलंबित अधिकारियों को अब मुख्यालय से संबद्ध रहकर विभागीय जांच का सामना करना होगा। शासन की इस कार्रवाई से यह भी संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले समय में जिले के कुछ अन्य कर्मचारियों पर भी गाज गिर सकती है जो इस सिंडिकेट का हिस्सा थे। सरकारी जमीनों को भू-माफियाओं के चंगुल से मुक्त कराने और दोषी अधिकारियों को सजा दिलाने की यह प्रक्रिया अब और तेज होने की उम्मीद है।


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