उत्तर प्रदेश में नागरिकों की सुरक्षा और पुलिस प्रशासन की जवाबदेही को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक ऐतिहासिक और कड़ा रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति अब्दुल मोइन और न्यायमूर्ति बबीता रानी की खंडपीठ ने राज्य में लापता व्यक्तियों की बढ़ती संख्या और उन पर पुलिस द्वारा की जा रही कार्रवाई के अभाव को देखते हुए इसे एक गंभीर विषय माना है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बड़ी संख्या में लोगों का गायब होना और उन पर पुलिस का सुस्त रवैया न केवल चिंताजनक है बल्कि यह कानून व्यवस्था की स्थिति पर भी बड़े सवाल खड़े करता है। इसी के मद्देनजर अदालत ने अब इस पूरे मामले को जनहित याचिका के रूप में दर्ज कर विस्तृत सुनवाई करने का निर्णय लिया है।

आंकड़ों ने उजागर की प्रशासन की सुस्त कार्यप्रणाली

अदालत के समक्ष पेश किए गए आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं। जनवरी 2024 से जनवरी 2026 के बीच के समय अंतराल में प्रदेश भर से करीब एक लाख आठ हजार से अधिक लोगों के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज की गई। विडंबना यह रही कि इतने विशाल आंकड़े के बावजूद पुलिस प्रशासन ने केवल नौ हजार सात सौ मामलों में ही सक्रियता दिखाई या शुरुआती कार्रवाई की। बाकी के विशाल बहुमत वाले मामलों में पुलिस की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। कोर्ट ने प्रशासन के इस ‘लतीफी’ भरे रवैये को निराशाजनक करार दिया। अदालत का मानना है कि जब किसी परिवार का सदस्य लापता होता है तो वह केवल एक सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं होता बल्कि एक मानवीय त्रासदी होती है जिसे पुलिस ने गंभीरता से नहीं लिया।

विक्रमा प्रसाद की याचिका से शुरू हुआ कानूनी हस्तक्षेप

इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत विक्रमा प्रसाद नामक व्यक्ति की याचिका से हुई थी जिनका पुत्र जुलाई 2024 से लापता है। याचिकाकर्ता का आरोप था कि स्थानीय पुलिस उसके बेटे की तलाश में लगातार लापरवाही बरत रही है और बार-बार चक्कर लगाने के बाद भी कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं। इस व्यक्तिगत मामले की सुनवाई के दौरान जब अदालत ने प्रदेश का व्यापक डेटा खंगाला तो स्थिति काफी भयावह नजर आई। अदालत ने गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव से इस संबंध में विस्तृत हलफनामा मांगा था जिसके बाद यह सच सामने आया कि हजारों परिवार अपने अपनों की राह देख रहे हैं और सिस्टम मौन बैठा है।

न्यायपालिका की सख्त टिप्पणी और भविष्य की दिशा

अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा कि लापता व्यक्तियों के मामलों में अधिकारियों का ऐसा रुख स्वीकार्य नहीं है। पुलिस की इस कथित लापरवाही को जनहित के विरुद्ध मानते हुए पीठ ने निर्देश दिया कि इस मामले को व्यापक स्तर पर देखा जाए। अदालत ने साफ किया कि अब इस मुद्दे पर नियमित अंतराल पर सुनवाई होगी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि लापता लोगों को ढूंढने के लिए एक व्यवस्थित प्रक्रिया अपनाई जा रही है या नहीं। हाईकोर्ट की इस सख्ती के बाद अब राज्य के गृह विभाग और पुलिस महकमे में हलचल तेज हो गई है क्योंकि आने वाले समय में प्रशासन को हर एक लंबित मामले पर जवाबदेही तय करनी होगी।


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