वशिंगटन : अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक बड़ी अग्निपरीक्षा साबित हुई। ट्रेड टैरिफ लगाने के उनके प्रशासन के फैसले की Tariff Authority (टैरिफ अधिकारिता) पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने कड़ी पूछताछ की। छोटे व्यापारियों और 12 राज्यों के समूह द्वारा दी गई चुनौती की सुनवाई के दौरान कोर्ट का रुख ट्रंप के समर्थन में नहीं दिखा, जिसने उनके कॉन्फिडेंस को बुरी तरह से प्रभावित किया है।

​याचिकाकर्ताओं ने अपनी चुनौती में यह आधार बनाया है कि टैरिफ लगाने से पहले ट्रंप ने इसके संभावित प्रभावों पर विचार नहीं किया, न ही स्थिति समझने का कोई प्रयास किया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस संबंध में प्रशासन के साथ कोई आधिकारिक बैठक या कोई रिपोर्ट तैयार नहीं की गई थी। सुप्रीम कोर्ट के सामने अब यह साबित करना है कि ट्रंप के फैसले तार्किक और संवैधानिक रूप से सही थे और उन्होंने अपनी Tariff Authority का उल्लंघन नहीं किया।

'Tariff Authority' की संवैधानिक सीमा पर कोर्ट को संदेह

​सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने टैरिफ लागू करने के मामले में ट्रंप की Tariff Authority पर गंभीर सवाल खड़े किए। कोर्ट ने प्रशासन के तर्कों पर संदेह जाहिर करते हुए यह संकेत दिया कि अनिश्चितकालीन टैरिफ लगाने जैसे बड़े व्यापारिक फैसले बिना कांग्रेस के साथ बातचीत के नहीं लिए जा सकते। न्यायाधीशों की पूछताछ का मुख्य केंद्र यही था कि क्या राष्ट्रपति ने अपनी Tariff Authority का विस्तार संविधान द्वारा दी गई शक्तियों से अधिक किया है।


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​ट्रंप सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे अमेरिकी सॉलिसिटर जनरल डी. जान सायर ने तर्क दिया कि टैरिफ का मामला विदेश नीति से जुड़ा है और इसे राष्ट्रपति के विशेष अधिकार क्षेत्र के तहत देखा जाना चाहिए। उन्होंने कोर्ट से राष्ट्रपति के फैसले पर संदेह न करने की अपील की। सायर ने यह भी तर्क दिया कि Tariff Authority ट्रंप को व्यापार सौदों के दौरान "अमेरिका को पहले रखने" में मदद करती है, और यदि इस सुरक्षा कवच को हटा दिया गया, तो व्यापार में विरोध का सामना करने पर अमेरिका खुद को निहत्था महसूस कर सकता है।

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चीफ जस्टिस ने उठाया Tariff Authority और कांग्रेस के अधिकारों के हस्तक्षेप का सवाल

​मुख्य न्यायाधीश जान राब‌र्ट्स ने सुनवाई के दौरान ट्रंप के वकील से सीधा और संवैधानिक सवाल पूछा। उन्होंने कहा: "सवाल यह उठता है कि ट्रंप के इस फैसले से संविधान में कांग्रेस को सौंपे गए अधिकारों में हस्तक्षेप हुआ है या नहीं?" उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिकियों पर टैक्स लगाने की शक्ति हमेशा से ही कांग्रेस के हाथों में रही है। इन टैरिफों के जरिए राजस्व बढ़ाने की कोशिश की जा रही है, जो संवैधानिक तौर पर कांग्रेस की भूमिका में आता है।

​यह टिप्पणी सीधे तौर पर शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत और राष्ट्रपति की Tariff Authority की सीमा पर सवाल खड़े करती है। न्यायाधीशों की तीखी पूछताछ से यह स्पष्ट होता है कि कोर्ट Tariff Authority के संवैधानिक आधार की गहराई से जाँच कर रहा है।

ट्रंप का कॉन्फिडेंस हिला: 'Tariff Authority' का फैसला जून तक लंबित

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस हाई-प्रोफाइल केस में कोर्ट को अगले साल जून तक फैसला सुनाना है। सुनवाई से पहले, ट्रंप काफी कॉन्फिडेंट थे और उन्होंने इसे 'ऐतिहासिक फैसला' बताया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों द्वारा Tariff Authority पर उठाए गए गंभीर सवालों और प्रशासन के तर्कों पर संदेह जाहिर करने के बाद, अब मालूम होता है कि ट्रंप को एक बड़ा कानूनी झटका लगने की आशंका बढ़ गई है। यह मामला न केवल व्यापार नीति बल्कि राष्ट्रपति के कार्यकारी अधिकार और कांग्रेस की वित्तीय अधिकारिता के बीच की संवैधानिक सीमा को परिभाषित करने वाला साबित होगा, विशेष रूप से राष्ट्रपति की Tariff Authority को लेकर।

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