पश्चिम एशिया में इस समय सांसें थाम देने वाला तनाव बना हुआ है। ब्रिटेन के आरएएफ फेयरफोर्ड एयरबेस से अमेरिकी वायुसेना के घातक बी-1बी लांसर बॉम्बर और कई लड़ाकू विमानों ने उड़ान भरी है। इन विमानों का रुख सीधे ईरान की दिशा में बताया जा रहा है। विमानों के उड़ते ही पूरे इलाके में सैन्य हलचल कई गुना बढ़ गई है। मिडिल ईस्ट स्पेक्टेटर की ताजा जानकारी के मुताबिक, सीरिया के आसमान में भी अमेरिकी या इजरायली लड़ाकू विमानों की गतिविधियां अचानक तेज हो गई हैं, जो सीधे तौर पर ईरान की सीमा की तरफ बढ़ते दिख रहे हैं। जैसे ही ये विमान ऊपर से गुजरे, खराब अल-जिर एयरबेस के एयर डिफेंस सिस्टम को पूरी तरह सक्रिय कर दिया गया ताकि किसी भी संभावित हमले का तुरंत जवाब दिया जा सके।
ट्रंप की अचानक व्हाइट हाउस वापसी
इस सुलगते माहौल के बीच वाशिंगटन से आए एक घटनाक्रम ने दुनिया भर के रणनीतिकारों के कान खड़े कर दिए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कैंप डेविड का अपना तय दौरा बीच में ही खत्म कर एक दिन पहले अचानक व्हाइट हाउस लौट आए हैं। व्हाइट हाउस ने इस अचानक वापसी की कोई आधिकारिक वजह तो नहीं बताई है, लेकिन अमेरिकी विदेश विभाग ने मध्य पूर्व के छह देशों में मौजूद अपने नागरिकों के लिए सुरक्षा अलर्ट जारी कर दिया है। पर्दे के पीछे की हलचल यह भी है कि युद्ध रोकने के लिए तेहरान की शर्तें कतर के जरिए ट्रंप तक पहुंच चुकी हैं और वे उनके जवाब का इंतजार कर रही हैं। मंगलवार को न्यूयॉर्क में खाड़ी देशों के नेताओं के साथ ट्रंप की अहम बैठक होनी है। ऐसे में अगले 48 घंटे यह तय करेंगे कि मेज पर कोई कूटनीतिक हल निकलता है या फिर बारूद में चिंगारी भड़क उठती है।

ईरान की जमीन से आसमान तक चौकसी
हवाई सीमा पर इस तरह का दबाव बनते ही ईरान के सैन्य गलियारों में खलबली मच गई है। ईरानी सेना ने बिना कोई वक्त गंवाए अपनी सभी सैन्य टुकड़ियों के लिए 'कोड 100' जारी कर दिया है। यह ईरानी सेना का सबसे कड़ा और उच्चतम स्तर का अलर्ट माना जाता है, जिसका सीधा मतलब होता है कि खतरा बिल्कुल दरवाजे पर है। इस समय ईरान की जमीनी सेना, वायुसेना और नौसेना की सभी यूनिटें पूरी तरह एक्टिव मोड में आ चुकी हैं। संवेदनशील ठिकानों, मिसाइल डिपो और परमाणु केंद्रों के आसपास निगरानी को अचानक कई गुना कड़ा कर दिया गया है ताकि किसी भी अचानक होने वाली कार्रवाई से निपटा जा सके।
बढ़ती घबराहट के बीच निगरानी
सामने आ रही जानकारियों से साफ है कि आने वाले कुछ घंटे पूरे क्षेत्र के लिए बेहद संवेदनशील साबित हो सकते हैं। सीमाई इलाकों और रणनीतिक ठिकानों पर तैनात जवानों को हर सेकंड नजर बनाए रखने के कड़े आदेश दिए गए हैं। दोनों पक्षों की ओर से साधी गई चुप्पी और लड़ाकू जहाजों की लगातार बढ़ती आवाजाही से आसपास के देशों में भी भारी घबराहट है। दुनिया भर के रणनीतिकार इस पूरे घटनाक्रम पर टकटकी लगाए बैठे हैं, क्योंकि हवा में तैरती यह तनातनी अगर जरा भी आगे बढ़ी, तो इसका दायरा सीधे तौर पर एक बड़े टकराव में तब्दील हो सकता है।
क्या इस बार युद्ध सह पाएगा ईरान?
इस पूरे तनाव के बीच सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या ईरान एक और बड़ा सैन्य टकराव झेलने की हालत में है। सच यह है कि लंबे समय से लगे आर्थिक प्रतिबंधों, कमरतोड़ महंगाई और पहले के हमलों में हुए भारी नुकसान ने देश की कमर तोड़ रखी है। बुनियादी ढांचा पहले ही बदहाल है और अपनी रक्षा प्रणालियों को फिर से दुरुस्त करने में तेहरान को भारी पसीना बहाना पड़ रहा है। जनता भी रोजमर्रा की परेशानियों और आर्थिक बदहाली से त्रस्त है। ऐसे में अगर कोई नया युद्ध छिड़ता है, तो भारी तबाही के बाद संभलने की कोशिश कर रहे ईरान के लिए अपनी अर्थव्यवस्था और सैन्य ढांचे को संभाल पाना बेहद मुश्किल साबित होगा।
मिडिल ईस्ट तनाव को लेकर भारत की चिंताएं
अगर यह तनातनी आगे चलकर खुले युद्ध की शक्ल ले लेती है, तो इसका सीधा और गहरा असर भारत पर पड़ना तय है। सबसे पहला झटका कच्चे तेल की कीमतों पर लगेगा, क्योंकि खाड़ी देशों से होने वाली तेल सप्लाई में रुकावट आते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम आसमान छूने लगेंगे। इससे भारत में पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है, जिसका सीधा असर आम आदमी की जेब और रोजमर्रा की चीजों की महंगाई पर दिखेगा। इसके अलावा, खाड़ी देशों में लाखों भारतीय रोजी-रोटी के सिलसिले में रहते हैं, जिनकी सुरक्षा और वतन वापसी सरकार के लिए बहुत बड़ा सिरदर्द बन जाएगी। साथ ही समुद्री व्यापारिक रास्तों पर खतरा मंडराने से भारत के आयात और निर्यात पर भी बुरा असर पड़ेगा।
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