उत्तर प्रदेश में मदरसा शिक्षा के नाम पर चल रहे भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के खिलाफ मदरसा शिक्षा परिषद ने अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई को अंजाम दिया है। रजिस्ट्रार अंजना सिरोही द्वारा जारी आदेशों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शिक्षा के मंदिर में जालसाजी के लिए कोई जगह नहीं है। परिषद ने गहन जांच के बाद लखनऊ, आजमगढ़ और संतकबीरनगर के तीन प्रमुख मदरसों की मान्यता तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दी है। यह कार्रवाई केवल प्रशासनिक सुधार नहीं है बल्कि उन रसूखदारों को कड़ी चेतावनी है जो वर्षों से सरकारी नियमों की धज्जियां उड़ाकर राजकोष को चूना लगा रहे थे। जांच में सामने आए तथ्य इतने चौंकाने वाले हैं कि उन्होंने पूरे विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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भ्रष्टाचार की सबसे वीभत्स तस्वीर आजमगढ़ के मुबारकपुर स्थित मदरसा अशरफिया मिस्बाहुल उलूम में देखने को मिली है। यहां एक सहायक शिक्षक शमसुल हुदा खान वर्ष 2007 से ब्रिटेन में रह रहा है और वहां की नागरिकता भी प्राप्त कर चुका है लेकिन वह लगातार उत्तर प्रदेश सरकार से वेतन और सेवानिवृत्ति के लाभ लेता रहा। जांच में पाया गया कि शिक्षक पांच साल से अधिक समय तक बिना किसी सूचना के अनुपस्थित रहा और प्रबंधन ने मिलीभगत कर उसे पांच सौ से ज्यादा दिनों का मेडिकल अवकाश भी दिला दिया। मदरसा बोर्ड ने इसे राजकोष को वित्तीय क्षति पहुंचाने वाला एक सुनियोजित और संगठित अपराध माना है जिसमें प्रबंधन की भूमिका की भी सूक्ष्मता से जांच की जा रही है।
नियमों की बलि: कागजों पर चल रही थी शिक्षा की दुकान
राजधानी लखनऊ के मड़ियांव स्थित मदरसा हनफिया जियाउल कुरान में तो जमीन और भवन का ऐसा खेल खेला गया जिसे देख जांच टीम भी हैरान रह गई। यह मदरसा उस स्थान पर मिला ही नहीं जिसके नाम पर इसकी मान्यता ली गई थी। हैरानी की बात यह है कि जिस भवन में इसके संचालन का दावा किया गया वहां पहले से ही बेसिक शिक्षा विभाग का एक स्कूल चल रहा था। यानी एक ही परिसर के जरिए दो अलग-अलग विभागों को गुमराह किया जा रहा था। इसी तरह संतकबीरनगर में भी मदरसा नियमावली को ताक पर रखकर संचालन किया जा रहा था। इन कार्रवाइयों ने साफ कर दिया है कि अब बिना मानक और बिना पारदर्शी व्यवस्था के किसी भी मदरसे का संचालन प्रदेश में संभव नहीं होगा।
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