अवैध खनन का खेल बिना विभागीय संरक्षण के संभव नहीं होता और इस मामले में भी यही कड़वा सच सामने आया है। जांच के दौरान क्षेत्रीय लेखपाल और कानूनगो की भूमिका संदिग्ध पाई गई, जिसके बाद डीएम ने कड़ा रुख अपनाते हुए दोनों को निलंबित कर दिया। इन अधिकारियों पर आरोप है कि इन्होंने अपने क्षेत्र में हो रहे अवैध कार्यों की न केवल अनदेखी की, बल्कि कहीं न कहीं इसमें अपनी मौन सहमति भी दी। सरकारी तंत्र के भीतर बैठे इन सफेदपोश मददगारों पर हुई इस कार्रवाई से तहसील प्रशासन के अन्य कर्मचारियों में भी डर का माहौल है। यह निलंबन उन सभी लोक सेवकों के लिए चेतावनी है जो अपनी ड्यूटी से ज्यादा माफिया के प्रति वफादार रहते हैं।
गाबर कंपनी पर करोड़ों की पेनाल्टी
कार्रवाई का सबसे बड़ा प्रहार गाबर कंपनी पर हुआ है, जिसे अवैध रूप से मिट्टी का उठान करने का दोषी पाया गया। जिलाधिकारी ने कंपनी की मनमानी पर लगाम कसते हुए 3.63 करोड़ रुपये का भारी जुर्माना ठोक दिया है। नियमों को ताक पर रखकर किए गए इस अवैध खनन से न केवल पर्यावरण को क्षति पहुंची है, बल्कि सरकारी राजस्व को भी भारी चपत लगी है। जुर्माने की यह राशि हाल के वर्षों में अवैध खनन के मामलों में सबसे बड़ी वसूलियों में से एक मानी जा रही है। प्रशासन ने साफ कर दिया है कि मुनाफे की आड़ में किए जा रहे अवैध कार्यों की कीमत अब इसी तरह वसूल की जाएगी।
स्वार कोतवाली में कानूनी शिकंजा
केवल आर्थिक दंड और निलंबन तक ही यह मामला सीमित नहीं रहा, बल्कि अब इसकी आंच कोतवाली तक पहुंच गई है। स्वार कोतवाली में इस पूरे प्रकरण को लेकर मुकदमा दर्ज कराने और संबंधित धाराओं के तहत कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। पुलिस प्रशासन अब उन सभी कड़ियों को जोड़ने में जुटा है जो इस अवैध नेटवर्क का हिस्सा थीं। जिलाधिकारी की इस 'हार्ड-हिटिंग' कार्रवाई ने यह साबित कर दिया है कि खनन माफिया और उनके मददगारों के अच्छे दिन अब खत्म हो चुके हैं। आने वाले दिनों में कुछ और बड़े नामों पर गाज गिरना तय माना जा रहा है, जिससे इलाके में अवैध खनन के सिंडिकेट में पूरी तरह भगदड़ मची हुई है।
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