उत्तर प्रदेश की शासन व्यवस्था को भ्रष्टाचार मुक्त और गतिमान बनाने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस ई-ऑफिस प्रणाली की नींव रखी थी, उसे खुद सरकारी तंत्र के भीतर बैठे कुछ सुस्त पुर्जों ने जंग लगाने की कोशिश की है। सत्ता के गलियारों में पारदर्शिता का जो संकल्प मुख्यमंत्री ने वर्ष 2017 में लिया था, उसकी राह में रोड़ा बनने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों की पहचान अब सार्वजनिक हो चुकी है। मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर सचिवालय के करीब 93 विभागों को आधुनिक बनाने की इस मुहिम को ठंडे बस्ते में डालने वाले कर्मियों की संख्या कोई छोटी-मोटी नहीं बल्कि हजारों में है। सरकार की सख्त हिदायत के बावजूद फाइलों को डिजिटल पटल पर लाने के बजाय उन्हें पुराने ढर्रे पर चलाने की जिद अब इन कर्मियों की जेब पर भारी पड़ने वाली है।
एनआईसी की रिपोर्ट ने खोल दी सिस्टम की पोल
बीते दिनों जब एनआईसी ने विभागों की लॉग-इन रिपोर्ट पेश की, तो शासन इनकी संख्या देखकर दंग रह गया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 21 नवंबर से 20 दिसंबर के बीच प्रदेश के लगभग 58 प्रतिशत अफसरों और कर्मचारियों ने अपने ई-ऑफिस पोर्टल को खोलना तक उचित नहीं समझा। ऊर्जा विभाग जैसे महत्वपूर्ण महकमे की स्थिति सबसे ज्यादा शर्मनाक रही, जहां 75 रजिस्टर्ड यूजर्स में से एक ने भी पूरे महीने लॉग-इन नहीं किया। पीडब्ल्यूडी विभाग का हाल भी इससे जुदा नहीं है, जहां दस हजार से ज्यादा यूजर्स होने के बावजूद आधे से अधिक ने डिजिटल कार्यप्रणाली को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। यह लापरवाही केवल एक तकनीकी चूक नहीं है, बल्कि जनता की समस्याओं को लटकाने और भ्रष्टाचार के पुराने रास्तों को जीवित रखने की एक गहरी साजिश के रूप में देखी जा रही है।
वेतन पर रोक और जिम्मेदारी तय करने का कड़ा संदेश
मुख्यमंत्री के आदेश के बाद प्रमुख सचिव संजय प्रसाद ने इस लापरवाही पर कड़ा प्रहार करते हुए सभी मंडलायुक्तों और जिलाधिकारियों को स्पष्ट पत्र भेज दिया है। इस निर्देश में साफ कहा गया है कि ई-ऑफिस पर सक्रिय न रहने वाले 44994 कर्मचारियों को तब तक वेतन न दिया जाए जब तक वे अपनी कार्यशैली में सुधार न कर लें। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बार जवाबदेही केवल कर्मचारियों तक सीमित नहीं है। यदि किसी लापरवाह कर्मचारी को बिना ई-ऑफिस इस्तेमाल किए वेतन जारी किया जाता है, तो इसके लिए संबंधित कार्यालयाध्यक्ष और आहरण-वितरण अधिकारी व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे और उनके खिलाफ भी दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। यह कदम उन बाबुओं और अफसरों के लिए एक सीधा संकेत है जो सरकार की तकनीक को अपनी सुविधा के अनुसार ताक पर रखते आए हैं।
भ्रष्टाचार मुक्त यूपी के संकल्प की तरफ बढ़ता कदम
योगी सरकार का यह डिजिटल हंटर इस बात की तस्दीक करता है कि अब सरकारी फाइलों को अलमारियों में सड़ाने का दौर समाप्त हो चुका है। सिंचाई, कृषि, राजस्व और शिक्षा जैसे जनहित से सीधे जुड़े विभागों में हजारों की संख्या में निष्क्रिय यूजर्स का होना सरकार के विकास कार्यों की गति को धीमा करता है। अब जब वेतन पर सीधी चोट की गई है, तो सचिवालय से लेकर तहसीलों तक हड़कंप मच गया है। सरकार की मंशा साफ है कि साल के अंत तक ई-ऑफिस प्रणाली को ब्लॉक स्तर तक शत-प्रतिशत लागू किया जाए ताकि जनता को एक-एक फाइल के लिए दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें। यह आदेश उन तमाम सरकारी सेवकों के लिए एक चेतावनी है जो शासन की कार्यप्रणाली को अपनी जागीर समझते रहे हैं।
---समाप्त---