संभल में भड़की हिंसा की आग भले ही शांत हो गई हो, लेकिन उस दौरान हुई पुलिसिया कार्रवाई अब पुलिस के लिए गले की फांस बन गई है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट विभांशु सुधीर की अदालत ने एक ऐसा फैसला सुनाया है जिसने पुलिस महकमे में हड़कंप मचा दिया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से एएसपी अनुज चौधरी और इंस्पेक्टर अनुज तोमर सहित 12 पुलिसकर्मियों के विरुद्ध आपराधिक मामला दर्ज करने का निर्देश दिया है। यह आदेश किसी सामान्य शिकायत पर नहीं बल्कि उस बेबस पिता की गुहार पर आया है, जिसका बेटा पुलिस की कथित बर्बरता का शिकार हुआ था।

टोस्ट बेचने निकले युवक पर गोलियों की बौछार

घटना की संवेदनशीलता इस बात से समझी जा सकती है कि पीड़ित युवक आलम उस दिन दंगे का हिस्सा नहीं था, बल्कि वह अपनी रोजी-रोटी के लिए रस्क बेचने निकला था। जामा मस्जिद के पास भड़की हिंसा के दौरान आरोप है कि तत्कालीन सीओ अनुज चौधरी के आदेश पर पुलिस ने सीधी फायरिंग की। इस अंधाधुंध गोलीबारी में आलम को एक-दो नहीं बल्कि तीन गोलियां लगीं। वह खून से लथपथ होकर गिर पड़ा, लेकिन सिस्टम का खौफ ऐसा था कि घायल युवक और उसके परिवार ने अस्पताल जाने के बजाय मेरठ में छिपकर इलाज कराना बेहतर समझा। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि पुलिस ने न केवल उनका केस दर्ज करने से मना किया, बल्कि उल्टा पीड़ित के खिलाफ ही मुकदमा दर्ज कर उसे डराने का प्रयास किया।

अदालत की फटकार और पुलिस की चुप्पी

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने मामले की गंभीरता को समझते हुए यह पाया कि प्राथमिक स्तर पर पुलिस की भूमिका संदेहास्पद रही है। कोर्ट ने इस बात पर कड़ी नाराजगी जाहिर की कि 9 जनवरी 2026 को दिए गए प्रारंभिक आदेशों के बावजूद अब तक एफआईआर दर्ज क्यों नहीं की गई। अदालत ने पुलिस प्रशासन को आईना दिखाते हुए कहा कि न्याय की प्रक्रिया में देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। मजिस्ट्रेट ने सख्त लहजे में पुलिस को सात दिन के भीतर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का समय दिया है। यह आदेश उन अधिकारियों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो सत्ता और वर्दी के रसूख में कानून की मर्यादा को भूल जाते हैं।

संभल हिंसा में आया नया मोड़ 

इस न्यायिक आदेश ने संभल हिंसा की पूरी पटकथा को एक नया मोड़ दे दिया है। अब तक पुलिस केवल प्रदर्शनकारियों पर शिकंजा कस रही थी, लेकिन अब खुद पुलिसकर्मी ही कटघरे में खड़े हैं। एएसपी अनुज चौधरी और उनके मातहतों पर लगने वाले ये आरोप यदि जांच में सही पाए जाते हैं, तो यह पुलिस की कार्यशैली पर एक बड़ा काला धब्बा होगा। फिलहाल, पूरे संभल में इस आदेश की चर्चा है और लोग इसे लोकतंत्र में न्यायपालिका की सक्रियता के रूप में देख रहे हैं। अब देखना यह है कि प्रशासन सात दिन की समय सीमा के भीतर इस संवेदनशील मामले में क्या रुख अपनाता है और क्या दोषियों को सजा मिल पाती है।


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