उत्तर प्रदेश के रूपपुर गांव में एक हंसते-खेलते परिवार की खुशियां उस वक्त मातम में बदल गईं, जब बिजली विभाग के संविदा कर्मी भानसिंह का शव पेड़ से लटका मिला। यह केवल एक आत्महत्या का मामला नहीं है, बल्कि एक पुरुष को मानसिक रूप से इस कदर तोड़ने की कहानी है कि उसने मौत को गले लगाना बेहतर समझा। भानसिंह सैफनी बिजलीघर में अपनी सेवाएं दे रहा था, लेकिन पिछले कुछ समय से वह अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी जंग अपनों के बीच ही हार रहा था। आरोप है कि पड़ोसी गांव देवीपुरा की रहने वाली रेखा पाल उसे लगातार ब्लैकमेल कर रही थी। पुरानी पहचान को हथियार बनाकर महिला ने भानसिंह को इस कदर प्रताड़ित किया कि वह अपने ही घर में घुटने लगा था। उसने अपनी पत्नी और माता-पिता के सामने उस घुटन का जिक्र भी किया था, लेकिन किसे पता था कि यह दबाव एक दिन उसे मौत की दहलीज तक ले जाएगा।

झूठे मुकदमे का घातक प्रहार

ब्लैकमेलिंग का यह खेल केवल धमकियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें कानून का इस्तेमाल हथियार के रूप में किया गया। परिजनों के अनुसार भानसिंह ने इस उत्पीड़न से बचने के लिए अपनी भैंस बेचकर पचास हजार रुपये भी महिला को दिए थे, लेकिन लालच की कोई सीमा नहीं थी। जब भानसिंह ने और पैसे देने से हाथ खड़े कर दिए, तो आरोपी महिला ने उस पर छेड़छाड़ का गंभीर मुकदमा दर्ज करा दिया। 11 जनवरी को दर्ज हुई इस प्राथमिकी ने भानसिंह के आत्मसम्मान को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया। समाज में बदनामी का डर और पुलिसिया कार्रवाई के खौफ ने उसे इस कदर मानसिक अवसाद में धकेला कि रविवार शाम घर से निकलने के बाद वह कभी जिंदा वापस नहीं लौटा। अगले दिन जंगल में उसका शव मिलना इस बात का प्रमाण है कि कानून की धाराओं का गलत इस्तेमाल किसी निर्दोष की जान भी ले सकता है।

इंसाफ की उम्मीद और पुलिसिया जांच

भानसिंह की मौत के बाद अब पुलिस महकमे में हलचल तेज है। पुलिस ने आरोपी महिला के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का मुकदमा दर्ज कर लिया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या केवल एफआईआर दर्ज कर लेना ही काफी है? मृतक के परिजनों ने साफ तौर पर कहा है कि यह एक सोची-समझी साजिश थी, जिसमें भानसिंह को आर्थिक और सामाजिक रूप से बर्बाद करने की कोशिश की गई। पुलिस अब पोस्टमार्टम रिपोर्ट, मोबाइल फोन की कॉल डिटेल और पैसों के लेन-देन से जुड़े साक्ष्यों को खंगाल रही है। गांव में इस घटना को लेकर भारी आक्रोश है और लोग न्याय की मांग कर रहे हैं। इस मामले ने एक बार फिर ब्लैकमेलिंग और फर्जी मुकदमों के बढ़ते खतरे की ओर इशारा किया है, जिसमें एक मेहनतकश इंसान को अपनी बेगुनाही साबित करने का मौका मिलने से पहले ही अपनी जान गंवानी पड़ी।


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